एमपी में व्हाट्सएप से चल रहा स्कूल शिक्षा विभाग, 6000 वोकेशनल ट्रेनर्स की सेवा समाप्ति और वेतन कटौती

Updesh Awasthee
भोपाल, 6 जून 2026
: मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे लाखों बच्चों को हुनरमंद बनाने वाले 6000 से अधिक व्यावसायिक प्रशिक्षकों (Vocational Trainers) का भविष्य इस समय गंभीर संकट में है। स्कूल शिक्षा विभाग (DPI) और निजी कंपनियों (VTPs) के एकतरफा और तानाशाही रवैये के खिलाफ प्रदेशभर के ट्रेनर्स में भारी आक्रोश व्याप्त है। गंभीर आरोप है कि विभाग के महत्वपूर्ण और नीतिगत निर्णय किसी लिखित या वैधानिक आदेश के बजाय केवल 'व्हाट्सएप मैसेज' के जरिए थोपे जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर प्रशासनिक पारदर्शिता और श्रम कानूनों का मजाक है।

​एक दशक पुरानी व्यवस्था को व्हाट्सएप संदेश से बदला

​न्यू वोकेशनल एजुकेशन-ट्रेनर्स एसोसिएशन (NVETA) द्वारा हाल ही में 4 जून 2026 को लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के आयुक्त को सौंपे गए ज्ञापन में विभाग की इस कार्यप्रणाली की पोल खोली गई है। प्रदेश अध्यक्ष जगदीश परमार का कहना है कि जो व्यावसायिक प्रशिक्षक पिछले 10 वर्षों से लगातार प्रदेश के स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें 1 जून 2026 से महज एक व्हाट्सएप संदेश के आधार पर काम से रोक दिया गया है। ​सहायक संचालक के नाम से ग्रुप्स में प्रसारित मैसेज में एग्रीमेंट खत्म होने का हवाला देकर ट्रेनर्स को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। एसोसिएशन ने इसे "सर्विस ब्रेक" की एक बेहद अनुचित और दमनकारी व्यवस्था बताते हुए तुरंत सेवा बहाली की मांग की है।

WhatsApp Governance Row in MP Education Department: 6,000 Vocational Trainers Face Service Termination and Salary Cuts

​बिना लिखित आदेश काटी सैलरी, रविवार का मानदेय भी हड़पा! 
ट्रेनर्स को पिछले 10 साल से प्रति माह मिलने वाला एक आकस्मिक अवकाश (CL) दिसंबर से बिना किसी लिखित शासकीय आदेश के अचानक समाप्त कर दिया गया। तानाशाही यहीं नहीं रुकी; कंपनियों के समन्वयकों द्वारा लिखित धमकियां दी गईं कि यदि कोई ट्रेनर्स शनिवार या सोमवार को छुट्टी लेता है, तो उसका 'रविवार' का वेतन भी काट लिया जाएगा । इसके अलावा, "VT Manpower App" में तकनीकी विसंगतियों के चलते कई ट्रेनर्स का जायज वेतन भी रोका गया है, जिससे उनके सामने आर्थिक तंगी खड़ी हो गई है।

​दिल्ली-हरियाणा की तर्ज पर मिले हक, 12 महीने की हो सेवा
​एसोसिएशन ने ज्ञापन के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार के सामने तीखे सवाल और मांगें रखी हैं:
​वेतन विसंगति दूर हो: वर्तमान में एमपी के ट्रेनर्स को महज ₹20,000 मानदेय दिया जा रहा है, जबकि दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में इसी काम के लिए ₹38,000 से ₹42,000 तक सम्मानजनक वेतनमान दिया जाता है।

​निरंतरता की गारंटी: अन्य राज्यों की तरह मध्य प्रदेश में भी वोकेशनल ट्रेनर्स की सेवाएं बिना किसी 'सर्विस ब्रेक' के पूरे 12 महीने संचालित की जाएं।
​छुट्टियों का अधिकार: ट्रेनर्स के लिए 13 आकस्मिक अवकाश, मेडिकल लीव और महिला प्रशिक्षकों के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) की व्यवस्था तुरंत बहाल हो।

4 बड़े सवाल:
1.​प्रशासनिक वैधता पर सवाल: क्या प्रदेश के सबसे बड़े विभागों में से एक 'स्कूल शिक्षा विभाग' में सेवा शर्तें और टर्मिनेशन अब कागजी आदेशों के बजाय सिर्फ व्हाट्सएप मैसेजेस से तय होंगे?
2.​श्रम कानूनों का उल्लंघन: बिना किसी लिखित और वैधानिक आदेश के कर्मचारियों की छुट्टियां समाप्त करना और रविवार का वेतन काटना किस नियम के तहत वैध है?
3.​छात्रों के भविष्य से खिलवाड़: 6000 से अधिक अनुभवी प्रशिक्षकों को अचानक हटा देने से सरकारी स्कूलों में चल रही कौशल शिक्षा (Skill Education) और बोर्ड परीक्षाओं के बाद होने वाले प्रशिक्षणों पर जो ताला लगा है, उसका जिम्मेदार कौन है?
4.​अधिकारियों की चुप्पी: इतने बड़े विवाद और हजारों युवाओं के भविष्य के अधर में लटकने के बाद भी विभाग इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी क्यों नहीं कर रहा है?

​ग्राउंड रिपोर्ट:
स्कूलों में बच्चों का भविष्य संवारने वाले ये हुनरमंद शिक्षक आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। मामला अब सिर्फ 6000 परिवारों की रोजी-रोटी का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की प्रशासनिक पारदर्शिता का भी है। यदि सरकार और DPI ने इस 'डिजिटल तानाशाही' पर तुरंत रोक लगाकर लिखित रूप से सेवा बहाली नहीं की, तो यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।



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