ग्वालियर हाई कोर्ट की गजब शर्त: SCST का मुआवजा चाहिए तो शपथ पत्र लगाइए

Updesh Awasthee
ग्वालियर, 27 जून 2026:
ग्वालियर हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग पर अंकुश करने के लिए बड़ा ही न्यायपूर्ण रास्ता निकाला है। हाई कोर्ट ने पीड़ित महिला के सामने शर्त रहिए कि, उसे एक शपथ पत्र देना होगा जिसमें लिखा होगा कि वह अपने बयानों से मुकरेगी नहीं। यदि वह अपने बयान बदलता है तो मुआवजा की राशि भी वापस जमा करेगी। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में मुआवजा के लालच में कई बार एट्रोसिटी एक्ट के झूठे मामले देखने को मिले हैं। 

इसलिए एससी एसटी एक्ट में झूठे मामले दर्ज होते हैं

मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति जनजाति के व्यक्ति से यदि भेदभाव होता है तो उसे 85000 से लेकर 885000 तक मुआवजा राशि दी जाती है। यह राज्य और केंद्र की ओर से 50:50 के अनुपात में होती है। मुआवजा की राशि का भुगतान निम्न अनुसार किया जाता है:- 
  • मामला दर्ज होते ही 25% 
  • कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल होने पर: 50% 
  • दोष सिद्ध हो जाने पर 25% 
मध्य प्रदेश में कुछ मामलों में देखा गया कि, झूठे मामले दर्ज करवाए गए। नियम के अनुसार कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल होने तक मुआवजा की 75% राशि मिल जाती है, तो यह लाभ ले लिया क्या और बाद में मुकर गए। मुकद्दर आने पर केवल मुआवजा के 25% का नुकसान होता है। इससे कहीं ज्यादा लाभ मुकर जाने के बदले में मिल जाता है। यह भी पाया गया कि भारत में कुछ लोग आपातकाल की स्थिति में पैसा बनाने के लिए इस व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं। 

Gwalior High Court Seeks Affidavit for SC/ST Compensation Claims

तो अब वापस आते हैं अपनी कहानी पर, ग्वालियर हाईकोर्ट में एक युवती ने चार्जशीट दाखिल होने के बाद देय आर्थिक सहायता जारी कराने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कई मामलों में पीड़ित पक्ष मुआवजा प्राप्त करने के बाद ट्रायल के समय अपने बयान बदल देता है, जिससे अभियोजन कमजोर पड़ता है और सरकारी सहायता का उद्देश्य विफल हो जाता है। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी पीड़िता से विधिवत हलफनामा प्राप्त करें। 

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि ट्रायल के दौरान वह अपने आरोपों से पीछे हटती है या गवाही से मुकरती है तो उसे फैसले के 30 दिन के भीतर पूरी सहायता राशि वापस करनी होगी। राशि जमा नहीं करने पर उसकी वसूली की जा सकेगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

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