सरकार ने आदेश जारी नहीं किया इससे कर्मचारी का अधिकार समाप्त नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 1 जून 2026
: भारत सरकार और भारत के विभिन्न राज्य सरकारों के लिए काम कर रहे हैं करोड़ों कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आज के ऐतिहासिक फैसले से राहत मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने किसी कर्मचारी को नियमित करने का आदेश जारी नहीं किया है, तो यह सरकार की गलती है, इसके कारण कर्मचारियों का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। उनको एक नियमित कर्मचारी की भांति सभी सुविधाएं और लाभ मिलने चाहिए।

History of casual labourers in Department of Posts Bihar case details

यह मामला बिहार के मधुबनी जिले के नगर पोस्ट ऑफिस में कार्यरत रहे तीन आकस्मिक श्रमिकों (नाइट गार्ड) और उनके परिवारों के संघर्ष से जुड़ा है। भीखनी देवी, जो स्वर्गीय सूरज साह की विधवा हैं, ने अपने पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन के लिए यह लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। सूरज साह को 12 फरवरी 1972 को आकस्मिक श्रमिक के रूप में नियुक्त किया गया था। उनके साथ ही बहुरू साहु (नियुक्ति 1971) और पीतांबर झा (नियुक्ति 1981) ने भी डाक विभाग में दशकों तक अपनी सेवाएं दीं। इन कर्मचारियों ने बिना किसी रुकावट के कई दशकों तक काम किया, लेकिन सेवानिवृत्ति के समय उन्हें पेंशन देने से इनकार कर दिया गया।

Casual Labourers Grant of Temporary Status and Regularisation Scheme 1991 details

न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद, डाक विभाग ने "Casual Labourers (Grant of Temporary Status and Regularisation) Scheme, 1991" लागू की थी। इस योजना के तहत, सूरज साह, बहुरू साहु और पीतांबर झा को 29 नवंबर 1989 से 'अस्थाई दर्जा' (Temporary Status) प्रदान किया गया। इसके बाद, 1992 के एक विभागीय परिपत्र के माध्यम से यह तय किया गया कि जिन श्रमिकों ने अस्थाई दर्जे में तीन साल की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें अस्थाई ग्रुप 'D' कर्मचारियों के बराबर माना जाएगा और वे उन्हीं लाभों के हकदार होंगे। इसी आधार पर इन्हें ग्रुप 'D' के समान वेतन और भत्ते भी मिलने लगे थे।

Government arguments against pension for temporary status employees in India

भारत सरकार (प्रतिवादी) और डाक विभाग का मुख्य तर्क यह था कि इन कर्मचारियों को कभी भी 'औपचारिक रूप से नियमित' (Formally Regularised) नहीं किया गया था। सरकार के अनुसार, 1991 की योजना के क्लॉज 6 के तहत, पेंशन लाभ केवल तभी मिल सकते थे जब कर्मचारी को ग्रुप 'D' के पद पर नियमित किया गया हो। सरकार ने दलील दी कि चूंकि ये कर्मचारी सेवानिवृत्ति तक 'अस्थाई दर्जा' प्राप्त श्रमिक ही रहे, इसलिए वे CCS (Pension) Rules, 1972 के तहत पेंशन के हकदार नहीं हैं। इसके अलावा, सरकार ने वित्तीय बोझ का भी हवाला दिया।

Legal arguments for pension eligibility of non-regularised temporary staff Supreme Court

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि इन कर्मचारियों ने 30 से 40 वर्षों तक निरंतर सेवा की है। उन्होंने CCS (Temporary Service) Rules, 1965 के नियम 10(1-B) का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई अस्थाई सरकारी कर्मचारी 10 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद सेवानिवृत्त होता है, तो वह पेंशन का हकदार है। अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि पेंशन का दावा एक 'निरंतर कारण' (Continuing Cause of Action) है, इसलिए इसे देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि प्रशासन की निष्क्रियता के कारण उनका नियमितीकरण नहीं हुआ, जिसमें कर्मचारियों की कोई गलती नहीं थी। 

Is pension a constitutional right under Article 300A Supreme Court explanation

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति अगस्त्य जॉर्ज मसीह की पीठ ने Pension rights of casual labourers with temporary status Supreme Court judgment सुनाते हुए स्पष्ट किया कि पेंशन कोई खैरात (bounty) नहीं है, जो देने वाली की मर्जी पर निर्भर हो। न्यायालय ने 'जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव' मामले का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन अनुच्छेद 300A के तहत "संपत्ति" के समान एक संवैधानिक अधिकार है। न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक 'मॉडल नियोक्ता' के रूप में सरकार को अपने कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए और प्रशासनिक देरी का खामियाजा गरीब श्रमिकों को नहीं भुगतना चाहिए।

Eligibility for pension without formal regularisation order in postal department rules

न्यायालय ने 1992 के परिपत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें इस्तेमाल शब्द "such as" (जैसे कि) यह दर्शाता है कि अस्थाई ग्रुप 'D' कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों की सूची केवल उदाहरण मात्र थी, वह सीमित नहीं थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Eligibility for pension without formal regularisation order in postal department पूरी तरह वैध है, यदि कर्मचारी ने निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर ली हो। न्यायालय के अनुसार, 1965 के नियमों का Rule 10(1-B) स्पष्ट रूप से 10 वर्ष की सेवा वाले अस्थाई कर्मचारियों को पेंशन का अधिकार देता है।

Supreme Court final decision Bhikhani Devi vs Union of India 2026 verdict

1 जून, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और Bhikhani Devi vs Union of India 2026 case summary के तहत अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया। न्यायालय ने आदेश दिया कि: सूरज साह, बहुरू साहु और पीतांबर झा ने 10 वर्ष से अधिक की पात्रता सेवा पूरी की है, इसलिए वे पेंशन के हकदार हैं।
सरकार को 3 महीने के भीतर सभी पेंशन लाभों की गणना कर भुगतान करना होगा।
देरी होने पर सरकार को 6% वार्षिक ब्याज देना होगा।
बकाया (Arrears) का भुगतान ट्रिब्यूनल में आवेदन फाइल करने की तारीख से पिछले 3 साल 2 महीने की अवधि के लिए किया जाएगा। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी, पत्रकार एवं विधि सलाहकार।

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