Story of Bhopal’s Ancient Badwale Mahadev Temple - भोपाल के प्राचीन बड़वाले महादेव मंदिर शिवालय की कथा

Updesh Awasthee
भोपाल, 2 जून 2026:
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सबसे प्राचीन मंदिरों में बड़ेवाले महादेव मंदिर का नाम, भोजपुरी वाले भोजेश्वर शिव मंदिर के बाद दूसरे नंबर पर आता है। यह अपने आप में एक चमत्कारी शिवलिंग है, क्योंकि यह मानव निर्मित नहीं बल्कि स्वयंभू शिवलिंग है। कहते हैं कि यहां पर सिर्फ एक तांबे का लोटा जल से शिवलिंग का अभिषेक करने पर मनोकामना पूरी हो जाती है। आज हम आपको भोपाल शहर के सबसे प्राचीन मंदिर की कथा सुनाने जा रहे हैं। 

Story of Bhopal’s Ancient Badwale Mahadev Temple: A Sacred Shrine Steeped in History

यह बात लगभग 400 वर्ष पुरानी है। 1626 ईस्वी, विक्रम संवत 1683 के आसपास की बात है। जिस स्थान पर भोपाल का सबसे व्यस्ततम चौक बाजार (सराफा बाजार) स्थित है, वहां पर घना जंगल हुआ करता था। जहां आज मंदिर बना हुआ है वहां पर एक विशाल वटवृक्ष (बरगद का पेड़) था। इसी वटवृक्ष के नीचे एक शिवलिंग प्रकट हुआ। जंगल में आने वाले चरवाहों ने शिवलिंग के आसपास की जमीन की सफाई करना शुरू कर दिया। कहते हैं कि शिवलिंग की आज जो आकृति दिखाई देती है। उसको प्रकट होने में 21 दिन का समय लगा। इसीलिए यहां पर महाशिवरात्रि के अवसर पर 21 दिन का समारोह मनाया जाता है। जब चरवाहों को और आसपास के ग्रामीणों को यह पूरी तरह से विश्वास हो गया कि एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ है तो उन्होंने श्रद्धापूर्वक इसके चारों तरफ एक चबूतरा बना दिया। प्राचीन काल में आस्था केंद्र को सुरक्षित करने के लिए, यही परंपरा थी। 

भोपाल में बड़ वाले महादेव मंदिर का निर्माण किसने किया

क्योंकि यह शिवलिंग एक विशाल वट वृक्ष के नीचे था। लोग इस वट वृक्ष को बड़ा वाला बरगद कहते थे। इसलिए मंदिर का नाम बड़े बरगद वाले महादेव कहा जाने लगा जो कालांतर में बड़ वाले महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कुछ ब्राह्मण और विद्वानों ने इस मंदिर का नाम बाबा बटेश्वर घोषित किया। लोगों ने यहां श्रद्धापूर्वक पूजा अर्चना प्रारंभ कर दी और उनके जीवन में चमत्कारी परिवर्तन होने लगे। इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है की सबसे पहले मंदिर किसने बनाया। केवल इतना पता चलता है कि श्रद्धालुओं द्वारा किए गए श्रमदान से पहले मंदिर बनाया गया। मतलब मंदिर में पूजा करने वाले भक्तगणों ने ही मंदिर का निर्माण किया। इसमें मजदूरों का उपयोग नहीं किया गया था। 

मंदिर परिसर का दिव्य पुनर्निर्माण

भोपाल के ऐतिहासिक अभिलेख में इस मंदिर के निर्माण का श्रेय किसी भी शासन को नहीं दिया गया है। समय के साथ भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार किया। हाल ही में एक बार फिर भक्तों द्वारा दान किए गए धन से मंदिर परिसर का दिव्य पुनर्निर्माण किया गया है। इस बार मंदिर में मकराना और धौलपुर के पत्थरों का उपयोग किया गया है। 

यहां स्थापित शिवलिंग को आप बड़े वाले महादेव कहे या बाबा बटेश्वर, लेकिन एक बात स्थापित है कि यह मंदिर स्वयंभू भगवान शिव और उनके स्वप्रेरित भक्तों के अनूठे संबंध का जीवित प्रमाण है। शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ और भव्य मंदिर का निर्माण भी भक्तों के द्वारा किया गया। इसमें किसी भी प्रकार के शासन का योगदान नहीं है। जो इस विश्वास को मजबूत करता है कि इस मंदिर परिसर में आने वाले भक्तों को वह प्राप्त होता है जो, उनके जीवन को आनंद से भर देता है। यहां भक्ति इतनी अधिक जागृत होती है कि, भक्तगण अपने आप शंभू के स्वयंसेवक बन जाते हैं। प्रस्तुति: श्यामला ज्योतिष पीठ, भोपाल; लेखक उपदेश अवस्थी।

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