1 मई 2026 को पड़ने वाली वैशाख पूर्णिमा न केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बुद्ध पूर्णिमा के रूप में पावन है, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर 'निर्णयसिंधु', के अनुसार भी यह तिथि अक्षय पुण्य अर्जित करने का एक दुर्लभ अवसर है। यह दिन ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संतुलन और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक एवं पौराणिक महत्व: विष्णु और बुद्ध का पावन पर्व
वैशाख पूर्णिमा का धार्मिक आधार अत्यंत गहरा है, जहाँ यह भगवान विष्णु और गौतम बुद्ध, दोनों के दिव्य अवतारों से जुड़ा है:
भगवान बुद्ध और सत्य का संदेश: इसी तिथि पर महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधगया) और महापरिनिर्वाण हुआ था। यह दिन करुणा, अहिंसा और मानसिक शुद्धि का संदेश देता है।
कूर्म अवतार का प्राकट्य: 'निर्णयसिंधु' के अनुसार, वैशाख मास की विभिन्न तिथियों में भगवान विष्णु के अवतारों का वर्णन है, जिसमें कूर्म (कछुआ) अवतार का विशेष महत्व इसी कालखंड से जुड़ा है।
मधुसूदन पूजन: पूरे वैशाख मास में भगवान मधुसूदन की पूजा का विधान है। पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण की कथा और श्री विष्णु के सहस्रनाम का पाठ अनंत फलदायी माना गया है। वैशाख मास को 'माधय मास' भी कहा जाता है, जो भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ समय है।
शिवलिंग पर अभिषेक और बेलपत्र
वैशाख मास अथवा पूर्णिमा (यदि पूरे माह न कर सकें तो) में भगवान शिव की शीतलता के लिए मिट्टी के पात्र (घड़े) का दान और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना विशेष लाभकारी बताया गया है। इस समय बेल के फल का गूदा या शरबत अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। विभिन्न रसदार फलों ( बेल गन्ना, अंगूर, अनार, संतरा) के रस से भगवान शिव का अभिषेक करने से मनोवांछित फल और धन की प्राप्ति होती है।
त्रिविध स्नान की पूर्णता: वैशाख की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा, इन तीन तिथियों में विधिपूर्वक स्नान करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है । शास्त्रानुसार, तीर्थों, महानदियों या सरोवरों में सूर्योदय से पूर्व स्नान अत्यंत शुभ है।
अक्षय फल देने वाले दान:
धर्मघट दान: पके हुए अन्न और जल से भरे घड़े (धर्मघट) का दान पितरों और धर्मराज के निमित्त करने से गौदान के समान फल मिलता है।
कुसर (खिचड़ी) दान: इस दिन दस ब्राह्मणों को विधिपूर्वक खिचड़ी खिलाने से मनुष्य पापमुक्त हो जाता है।
दीपदान: संध्या के समय देवालयों या नदी के तट पर धार्मिक वृक्षों के नीचे दीपदान करने से जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है।
पीपल (पिप्पल) पूजा: पूर्णिमा पर पीपल की जड़ में जल देना और उसकी परिक्रमा करना 'निर्णयसिंधु' में देवताओं की तृप्ति का माध्यम बताया गया है।

