नई दिल्ली, 25 मई, 2026: सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया ने आज एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट कर दिया कि, नर्स या पैरामेडिकल स्टाफ की गलती के कारण यदि किसी मरीज को कोई नुकसान हो जाता है, अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है तो इसके लिए डॉक्टर को दंडित नहीं किया जा सकता। इसी के साथ न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले और न्यायमूर्ति पंकज मिथल की पीठ ने सुप्रिया कुमारी एम.सी. के खिलाफ दर्ज किया गए क्रिमिनल केस को रद्द कर दिया गया।
Doctor Cannot Be Punished for Nurse’s Mistake, Supreme Court Rules
यह मामला 28 मई, 2002 का है, जब के.पी. मुरलीधर नामक मरीज को बवासीर (Piles) के ऑपरेशन के लिए धनलक्ष्मी अस्पताल, कन्नूर (Dhanalakshmi Hospital, Kannur) में भर्ती कराया गया था। डॉ. सुप्रिया कुमारी वहां वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट के रूप में कार्यरत थीं। 29 मई को सुबह 9:30 बजे सफल सर्जरी हुई। शाम 5:00 बजे डॉ. सुप्रिया अपनी ड्यूटी खत्म कर घर चली गईं।
रात 8:00 बजे के बाद मरीज की स्थिति बिगड़ने लगी। डॉ. सुप्रिया ने फोन पर (SOS call) निर्देश दिए कि दर्द निवारक इंजेक्शन 'सेंसोरकेन' (Sensorcaine) दिया जाए। ऑन-ड्यूटी नर्स रोसम्मा वर्गीस (आरोपी संख्या 3) ने यह इंजेक्शन लगाया। इंजेक्शन लगने के कुछ घंटों बाद मरीज बेहोश हो गया और 30 मई को तड़के 4:00 बजे उसकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम में पता चला कि मरीज की कोरोनरी धमनी में 80% ब्लॉकेज था और मौत का कारण 'एक्यूट कोरोनरी इनसफिसिएंसी' (Acute coronary insufficiency) था।
अभियोजन (Prosecution) का पक्ष:
तर्क दिया गया कि यह 'घोर लापरवाही' (Gross negligence) का मामला है क्योंकि डॉक्टर को व्यक्तिगत रूप से इंजेक्शन लगाना चाहिए था। विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि यदि योग्य व्यक्तियों द्वारा दवा दी जाती तो मृत्यु को रोका जा सकता था। आरोप लगाया गया कि इंजेक्शन सही जगह (Epidural space) पर नहीं लगा, जिससे दर्द कम नहीं हुआ और उसी तनाव के कारण दिल का दौरा पड़ा।
अपीलकर्ता (डॉक्टर सुप्रिया) का पक्ष:
वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि डॉक्टर की शिफ्ट खत्म हो चुकी थी और उन्होंने केवल मानक चिकित्सा सलाह दी थी। दवा (सेंसोरकेन) सही थी, लेकिन नर्स द्वारा इसे ठीक से न लगा पाना डॉक्टर के नियंत्रण से बाहर था। मरीज को पहले से ही हृदय संबंधी बीमारी (80% ब्लॉकेज) थी, जिसकी जानकारी केवल पोस्टमार्टम में सामने आई। उपभोक्ता अदालत (Consumer Forum) पहले ही डॉक्टर को बरी कर चुकी थी।
न्यायालय का विश्लेषण और विशेष टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में 'जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य' मामले के ऐतिहासिक सिद्धांतों का उल्लेख किया।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक लापरवाही के लिए लापरवाही का स्तर 'अत्यंत उच्च' (Gross) होना चाहिए, जो सामान्य दीवानी (Civil) लापरवाही से अलग है। एक एनेस्थेटिस्ट जो ड्यूटी पर नहीं है, उसे स्टाफ नर्स द्वारा की गई प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने 'राधेश्याम केजरीवाल' मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि चूंकि जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम, कन्नूर ने डॉक्टर को मेरिट के आधार पर दोषमुक्त कर दिया था, इसलिए उसी तथ्य पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
Supreme Court Says Doctors Not Liable for Errors Committed by Nurses
न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले द्वारा लिखित निर्णय में निम्नलिखित आदेश दिए गए:
केरल हाई कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए डॉ. सुप्रिया कुमारी के खिलाफ IPC की धारा 304-A और 34 के तहत लंबित सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया गया। डॉक्टर को उन पर लगाए गए सभी आरोपों से मुक्त (Discharge) कर दिया गया।
धारा 482 CrPC का उपयोग: कोर्ट ने अपनी निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए कहा कि जब सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनाती, तो मुकदमे को जारी रखना अनुचित है। कोर्ट ने नोट किया कि विशेषज्ञ पैनल में कोई एनेस्थेटिस्ट शामिल नहीं था, जिससे उसकी तकनीकी समझ पर सवाल उठता है। अदालत ने अंत में स्पष्ट किया कि सर्जरी के बाद दर्द निवारक की सलाह देना एक सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया है, न कि कोई घोर आपराधिक कृत्य। यह फैसला भविष्य में उन डॉक्टरों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच बनेगा जो ड्यूटी के बाद भी फोन पर मरीजों की सहायता करते हैं। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (पत्रकार एवं लीगल एडवाइजर)।

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