धर्म एवं ज्योतिष न्यूज डेस्क, 19 मई 2026: शास्त्रों और सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखने वाले पुरुषोत्तम मास (मलमास या अधिमास) को लेकर श्रद्धालुओं में हमेशा उत्सुकता रहती है। सनातन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ 'निर्णयसिंधु' के अनुसार, यह काल भौतिक इच्छाओं के त्याग और आध्यात्मिक शुद्धि के माध्यम से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का महापर्व है।
Purushottam Maas 2026: What to Do and What to Avoid for Spiritual Well-Being
सनातन धर्म में काल गणना और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से 'पुरुषोत्तम मास' (जिसे मलमास या अधिमास भी कहा जाता है) का अत्यंत विशेष स्थान है। शास्त्रों में इसे भगवान श्रीहरि विष्णु का प्रिय मास माना गया है। आम तौर पर लोग इसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित मानते हैं, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति, जप-तप और दान के लिए इस महीने को सर्वोत्तम फलदायी बताया गया है। आइए 'निर्णयसिंधु' और अन्य पौराणिक ग्रंथों के आधार पर जानते हैं कि पुरुषोत्तम मास की गणना कैसे होती है और इस दौरान किन नियमों का पालन अनिवार्य है।
क्या है पुरुषोत्तम मास और इसकी काल गणना?
'निर्णयसिंधु' के अनुसार, जिस चंद्रमास में सूर्य की कोई संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, उसे मलमास या अधिमास कहा जाता है। इसके विपरीत, जब एक ही महीने में दो संक्रांतियाँ हो जाती हैं, तो उसे 'क्षयमास' कहते हैं। प्रसिद्ध वशिष्ठ ऋषि के गणना सिद्धांतों के अनुसार, अधिमास का चक्र तय समय पर आता है। यह लगभग 32 महीने, 16 दिन और 4 घड़ी की अवधि बीतने के बाद दोबारा पड़ता है।
वर्जित कार्य: भूलकर भी न करें ये काम
मलमास के दौरान 'काम्य कर्म' यानी किसी विशेष सांसारिक फल या मनोकामना की इच्छा से किए जाने वाले मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक होती है:
• प्रमुख संस्कार: विवाह, यज्ञोपवीत (उपनयन), बच्चों का प्रथम मुंडन (चूड़ाकर्म), नामकरण और अन्नप्राशन जैसे शुभ संस्कार इस अवधि में वर्जित हैं।
• निर्माण और प्रतिष्ठा: नए घर का निर्माण शुरू करना (गृह आरम्भ), गृहप्रवेश, देवताओं की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा, कुआं-तालाब खुदवाना या बाग लगवाना इस मास में निषेध माना गया है।
• अन्य धार्मिक वर्जनाएं: किसी नए व्रत की शुरुआत करना, तीर्थ यात्रा पर निकलना, संन्यास ग्रहण करना और राजा का अभिषेक करना इस दौरान शास्त्रसम्मत नहीं है।
अनुकरणीय कार्य: इन कामों को करने की है अनुमति
यद्यपि इस महीने में मांगलिक कार्य थमे रहते हैं, लेकिन दैनिक और अनिवार्य कर्मों पर कोई रोक नहीं होती:
• नित्य और नैमित्तिक कर्म: आपकी दैनिक पूजा-पाठ (संध्यावंदन), संतान जन्म के समय होने वाला जातकर्म संस्कार, श्राद्ध कर्म और बीमारी आदि की शांति के लिए किए जाने वाले विशेष अनुष्ठान निर्बाध रूप से किए जा सकते हैं।
• तीर्थ स्नान और दान: इस पवित्र महीने में पवित्र नदियों में स्नान और सामर्थ्य अनुसार दान करने का विशेष महत्व है।
33 मालपुआ दान का है महा-महत्व
पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए एक विशिष्ट दान परंपरा का उल्लेख मिलता है:
• दान की विधि: इस मास में गुड़ और घी से बने 33 मालपुओं (अपूप) को कांसे के पात्र (बर्तन) में रखकर, घी के साथ ब्राह्मण को दान करने का विधान है।
• 'हेमाद्रि' ग्रंथ के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन या इस मास के समापन पर यह विशिष्ट दान करता है, उसे पूरी पृथ्वी दान करने के समान अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है।
• मंत्र और प्रार्थना: दान करते समय श्रद्धालु यह प्रार्थना करते हैं कि "विष्णुरूपी भगवान पुरुषोत्तम मेरे समस्त पापों का नाश करें और मुझे पुत्र तथा संपत्ति प्रदान करें।"
विशेष शास्त्रीय नियम: जो जानना जरूरी है
शास्त्रों में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियां बताई गई हैं जहाँ मलमास के नियम बदल जाते हैं:
• यदि ज्येष्ठ मास के दौरान मलमास पड़ता है, तो गंगा दशहरा को अगले शुद्ध महीने के लिए नहीं टाला जाता। इसे उसी मलमास में ही पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
• यदि किसी व्यक्ति का देहावसान मलमास के दिनों में हुआ हो, तो उसका वार्षिक श्राद्ध (प्रतिवार्षिक श्राद्ध) आगामी वर्षों में भी उसी मलमास के आने पर किया जाता है।
पुरुषोत्तम मास वास्तव में सांसारिक दौड़-भाग और भौतिक इच्छाओं से थोड़ा विराम लेकर खुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने का समय है। संयम, नियम और श्रद्धा के साथ किया गया दान-पुण्य इस महीने में मनुष्य के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। प्रस्तुति: गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

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