इंश्योरेंस कंपनी क्लेम देने को तैयार नहीं थी, गरीब मजदूर के परिवार को सुप्रीम कोर्ट तक लड़ना पड़ा

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 25 मई, 2026:
इंश्योरेंस यानी बीमा का समर्थन करने वालों को, क्लेम सेटेलमेंट के मामलों की समीक्षा भी करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐसे मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो इस बात का उदाहरण भी है कि, सुप्रीम कोर्ट में गरीब मजदूर को भी न्याय मिलता है। इंश्योरेंस कंपनी ने केस में छोटी-मोटी तकनीकी गड़बड़ी बताकर क्लेम रिजेक्ट कर दिया। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण और हाई कोर्ट से भी न्याय नहीं मिला लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक आदर्श न्याय दृष्टांत प्रस्तुत किया। 

Insurance Company Refused Claim, Poor Labourer’s Family Fought Till Supreme Court

यह मामला 21 मई, 2004 का है, जब राज कुमार दास, जो पेशे से ईंट भट्ठे में मज़दूर थे, शाम लगभग 5:00 बजे मंडलपारा बस स्टॉप के पास एक रिक्शा से उतरे थे। रिक्शा का किराया देते समय, उन्हें WB-41-3999 पंजीकरण संख्या वाले एक लॉरी (ट्रक) ने टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में राज कुमार दास बेहोश हो गए और उन्हें गंभीर चोटें आईं, जिसके परिणामस्वरूप वे 'ट्रॉमेटिक पैराप्लेजिया' (Traumatic Paraplegia) का शिकार हो गए और उनका पूरा शरीर स्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गया।

पीड़ित ने 2005 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 163A के तहत मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान राज कुमार दास का निधन हो गया, जिसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी इस मामले को लड़ रहे हैं।

निचली अदालतों का रुख और विवाद के बिंदु
मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (11 सितंबर, 2007) और कलकत्ता हाई कोर्ट (27 सितंबर, 2022) दोनों ने इस आधार पर दावा खारिज कर दिया था कि दुर्घटना का तथ्य ही साबित नहीं हुआ है। अदालतों ने रिकॉर्ड में मौजूद कुछ विसंगतियों (Discrepancies) को आधार बनाया था:
  • पीड़ित की एमआरआई रिपोर्ट में "लॉरी से गिरना" (Fall from lorry) दर्ज था, जबकि पीड़ित का दावा था कि उसे लॉरी ने टक्कर मारी थी।
  • दुर्घटना 21 मई को हुई थी, लेकिन एफआईआर 8 अगस्त, 2004 को दर्ज की गई थी।
  • पीड़ित ने अपने बयान में वाहन का नंबर WB-41-2999 बताया था, जबकि एफआईआर और चार्जशीट में यह WB-41-3999 था।
  • दावे की पुष्टि के लिए किसी स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी का बयान नहीं लिया गया था।

न्यायालय का विश्लेषण और विशेष टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के "अति-तकनीकी दृष्टिकोण" (Hyper-technical approach) की कड़ी आलोचना की। न्यायालय ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है और मामूली विसंगतियों के आधार पर किसी गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के अधिकार को नहीं छीना जा सकता।

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

कोर्ट ने कहा कि आपातकालीन स्थिति में अस्पताल के कर्मचारी अक्सर तीमारदारों से मिली अधूरी जानकारी के आधार पर रिपोर्ट लिखते हैं; इसे दुर्घटना का सटीक पुनर्निर्माण नहीं माना जा सकता।
गंभीर चोटों के मामलों में, पीड़ित और उसका परिवार कानूनी औपचारिकताओं के बजाय इलाज को प्राथमिकता देता है, इसलिए देरी को दावे पर संदेह करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि 37 वर्षीय मज़दूर जो अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था, उसे तकनीकी कारणों से दो दशकों तक न्याय से वंचित रखा गया।

न्यायालय का निर्णय और मुआवजे का निर्धारण

न्यायालय ने अपने विशेषाधिकार (अनुच्छेद 142) का उपयोग करते हुए मुआवजे का निर्धारण स्वयं किया ताकि मामले को और अधिक न लटकाया जाए। कुल मुआवजा 14,90,000 रुपये, दावा दायर करने की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया गया है। बीमा कंपनी को तीन महीने के भीतर यह राशि न्यायाधिकरण में जमा करने का आदेश दिया गया है, जिसे तुरंत मृतक के वारिसों को जारी कर दिया जाएगा।

न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि धारा 163A के तहत "बिना गलती के दायित्व" (No-fault liability) के मामले में केवल यह साबित करना पर्याप्त है कि चोट वाहन से जुड़ी थी, वहां लापरवाही साबित करने की सख्त आवश्यकता नहीं होती। यह निर्णय भविष्य में उन गरीब पीड़ितों के लिए एक मिसाल बनेगा जिनके दावे दस्तावेजी त्रुटियों के कारण खारिज कर दिए जाते हैं। 

उच्चतम न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावों में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सामाजिक कल्याणकारी कानूनों के तहत दावों का फैसला "संभावनाओं की प्रबलता" (Preponderance of probability) के आधार पर होना चाहिए, न कि "संदेह से परे प्रमाण" के कठिन मानक पर। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज कुमार दास (मृतक) बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट और मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के फैसलों को पलटते हुए पीड़ित परिवार को 14.90 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

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