लीगल न्यूज डेस्क, 16 मई 2026: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा धार भोजशाला से संबंधित मामले का फैसला दे दिया गया है। बताया गया है कि अयोध्या के बाद भारत में इस प्रकार का यह दूसरा फैसला है। मुस्लिम पक्ष को नमाज पढ़ने की अनुमति वाले आदेश को रद्द कर दिया गया है। अब इसको लेकर देश भर में बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग अधूरी जानकारी के आधार पर पब्लिक को कंफ्यूज करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए हम यहां पर धार भोजशाला मामले से जुड़े हुए अक्सर पूछे जाने वाले सभी प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं। यह सभी उत्तर हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर हैं। हम अपनी तरफ से या किसी भी थर्ड पार्टी की तरफ से प्रस्तुत किए गए किसी भी तर्क को शामिल नहीं कर रहे हैं। जो कुछ हाईकोर्ट के फैसले में लिखा है, केवल उतना ही बता रहे हैं क्योंकि वही लागू होता है और उसी का कानूनी महत्व है:-
Dhar Bhojshala Case: Answers to Every Question Linked to the Dispute
प्रश्न 1: धार भोजशाला विवाद मुख्य रूप से क्या है?
उत्तर: धार (मध्य प्रदेश) स्थित भोजशाला एक प्राचीन और ऐतिहासिक संरक्षित स्मारक है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। हिंदू समुदाय इसे देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे 'कमल मौला मस्जिद' कहता है। मुख्य विवाद इस स्थल के मूल धार्मिक स्वरूप और वहां पूजा या नमाज़ करने के अधिकारों को लेकर है।
प्रश्न 2: भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व क्या है और इसका निर्माण किसने करवाया था?
उत्तर: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, परमार वंश के राजा भोज (1010-1055 ईस्वी) ने सन् 1034 में देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर की स्थापना की थी। यह केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि संस्कृत व्याकरण, ज्योतिष, खगोल विज्ञान और वेदों की शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ गुरुओं और शिष्यों के रहने का स्थान भी था। इसे 'सरस्वती सदन' के नाम से भी जाना जाता था।
प्रश्न 3: हिंदू पक्ष का इस स्थल को लेकर क्या दावा है?
उत्तर: हिंदू पक्ष का दावा है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को आंशिक रूप से नष्ट किया और उसके मलबे का उपयोग करके वहां मस्जिद जैसी संरचना खड़ी करने का प्रयास किया। उनका तर्क है कि पूरे परिसर में ऐसे कई चिन्ह, शिलालेख और मूर्तियाँ मौजूद हैं जो इसके हिंदू मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। वे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत वहां दैनिक पूजा करने के अपने मौलिक अधिकार की बहाली की मांग कर रहे हैं।
प्रश्न 4: मुस्लिम पक्ष का इस विवाद में क्या पक्ष है?
उत्तर: मुस्लिम पक्ष इसे 'कमल मौला मस्जिद' मानता है और उनका दावा है कि यहाँ हज़रत मौलाना कमलुद्दीन चिश्ती ने 1306-07 ईस्वी के आसपास मस्जिद की नींव रखी थी। वे इसे एक वक्फ संपत्ति मानते हैं और वहां सदियों से नमाज़ अदा किए जाने का दावा करते हैं। उनका तर्क है कि एएसआई की पिछली रिपोर्टों में इसे मस्जिद के रूप में ही उल्लेखित किया गया है।
प्रश्न 5: क्या इस विवाद में जैन समुदाय का भी कोई दावा है?
उत्तर: हाँ, जैन समुदाय ने भी इस विवाद में अपना पक्ष रखा है। उनके अनुसार, भोजशाला परिसर केवल हिंदू और मुस्लिम दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां जैन धार्मिक संरचनाओं और विद्वतापूर्ण परंपराओं के भी प्रमाण मिलते हैं। उनका तर्क है कि परिसर के स्तंभ और नक्काशी माउंट आबू के प्रसिद्ध जैन मंदिरों से मेल खाते हैं और यह पूर्व में एक जैन शिक्षा केंद्र भी रहा है।
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प्रश्न 6: भोजशाला विवाद का कानूनी इतिहास क्या है?
उत्तर: इस विवाद का कानूनी संघर्ष दशकों पुराना है। प्रमुख पड़ाव निम्नलिखित हैं:
1962: इस मामले में पहला दीवानी मुकदमा (Civil Suit No. 42 of 1962) अमीरउद्दीन नामक व्यक्ति द्वारा दायर किया गया था, जिसे 1969 में अदालत ने खारिज कर दिया था।
1997: विमल कुमार द्वारा एक याचिका दायर की गई, जिसमें हिंदुओं के पूजा के अधिकारों पर प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी।
2003: काज़ी ज़काउल्लाह ने एक याचिका दायर की, जिस पर हाई कोर्ट की एकल पीठ ने आदेश जारी किया था।
2022: 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' और अन्य द्वारा वर्तमान जनहित याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर हाल ही में बड़ा फैसला आया है।
प्रश्न 7: एएसआई (ASI) का 7 अप्रैल 2003 का आदेश क्या था जिसे चुनौती दी गई?
उत्तर: 7 अप्रैल 2003 को एएसआई के महानिदेशक ने एक आदेश जारी किया था जिसने परिसर में प्रवेश को विनियमित (regulate) किया था। इसके तहत:
मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार को दोपहर 1:00 से 3:00 बजे के बीच नमाज़ अदा करने की अनुमति दी गई थी।
हिंदू समुदाय को प्रत्येक मंगलवार को पूजा करने और बसंत पंचमी के दिन पारंपरिक उत्सव मनाने की अनुमति थी।
बाकी दिनों में पर्यटकों के लिए सशुल्क प्रवेश की व्यवस्था थी। हालिया याचिकाओं में इसी आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।
प्रश्न 8: धार रियासत (Dhar State) के 1935 के आदेश या 'ऐलान' का क्या महत्व है?
उत्तर: मुस्लिम पक्ष ने 24 अगस्त 1935 के एक गजट नोटिफिकेशन का हवाला दिया था, जिसमें धार के तत्कालीन महाराजा के प्रशासन ने सांप्रदायिक तनाव के बाद इस स्थान को मस्जिद के रूप में उपयोग करने और नमाज़ की अनुमति दी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था थी, न कि कोई स्थायी कानून, और यह संविधान के लागू होने के बाद मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती।
प्रश्न 9: क्या 'पूजा स्थल अधिनियम, 1991' (Places of Worship Act) इस विवाद पर लागू होता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय और स्रोतों के अनुसार, यह अधिनियम उन प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों पर लागू नहीं होता जो 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' के तहत संरक्षित हैं। चूंकि भोजशाला एक राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक है, इसलिए 1991 का अधिनियम इसके धार्मिक स्वरूप की जांच करने में बाधा नहीं बनता।
प्रश्न 10: वर्तमान याचिकाओं में हिंदू पक्ष ने मुख्य रूप से क्या राहतें मांगी थीं?
उत्तर: याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें रखी थीं:
घोषणा की जाए कि केवल हिंदुओं को ही परिसर में दैनिक पूजा का मौलिक अधिकार है।
मुस्लिमों को परिसर के भीतर नमाज़ या किसी भी धार्मिक गतिविधि से रोका जाए।
लंदन के संग्रहालय में रखी देवी वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाकर भोजशाला में पुन: स्थापित किया जाए।
एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के उस हिस्से को रद्द किया जाए जो नमाज़ की अनुमति देता है।
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प्रश्न 11: हाई कोर्ट द्वारा निर्देशित एएसआई (ASI) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को एक व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया था। इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या परिसर का निर्माण राजा भोज (1010-1055 ईस्वी) के शासनकाल में हुआ था, मूल रूप से निर्मित भवन की प्रकृति क्या थी, और क्या यह मूल रूप से एक मंदिर था, एक शिक्षा केंद्र था, या दोनों थे। इसके अलावा, यह भी जांचना था कि क्या 1300 से 1550 ईस्वी के बीच वहां कोई तोड़-फोड़ या नए निर्माण करके ढांचे में बदलाव किए गए थे।
प्रश्न 12: एएसआई (ASI) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष क्या रहे?
उत्तर: एएसआई ने अपनी 10 खंडों की विस्तृत रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि वर्तमान संरचना एक पूर्व-मौजूद विशाल संरचना के ऊपर खड़ी है, जिसके अवशेष वर्तमान स्तर से 4-5 मीटर नीचे तक पाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थल विभिन्न संरचनात्मक परतों (stratigraphy) को दर्शाता है, जिसमें निचली परतें बहुत पुरानी हैं और परमार कालीन ईंटों तथा बेसाल्ट पत्थरों से बनी हैं। सर्वेक्षण में पाया गया कि परमार कालीन मंदिर की मूल संरचना को नुकसान पहुँचाकर उसे मस्जिद के रूप में पुन: उपयोग (reuse) के लिए बदला गया था।
प्रश्न 13: सर्वेक्षण में परिसर के मूल धार्मिक स्वरूप के बारे में क्या साक्ष्य मिले?
उत्तर: सर्वेक्षण के दौरान कई महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक चिन्ह, संस्कृत और प्राकृत शिलालेख, और खंडित मूर्तियां मिलीं। एएसआई को मिले शिलालेखों में देवी सरस्वती (वाग्देवी) के मंदिर का स्पष्ट उल्लेख है और नागकणिका शिलालेखों ने पुष्टि की कि यह स्थान साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ा था। एएसआई ने वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि यह मूल रूप से 'शारदा सदन' (सरस्वती मंदिर) था, जिसे बाद में मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था।
प्रश्न 14: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने अंतिम फैसले में क्या मुख्य घोषणा की?
उत्तर: 15 मई 2026 को सुनाए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में, हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि विवादित भोजशाला परिसर का धार्मिक स्वरूप "वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला" का है। कोर्ट ने माना कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और वैज्ञानिक सर्वेक्षण यह सिद्ध करते हैं कि यह स्थान परमार वंश के राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा का केंद्र और मंदिर था।
प्रश्न 15: हाई कोर्ट ने पूजा और नमाज़ के अधिकारों के संबंध में क्या विशिष्ट निर्देश दिए?
उत्तर: उच्च न्यायालय ने एएसआई (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द (quash) कर दिया, जो हिंदुओं की पूजा को प्रतिबंधित करता था और मुस्लिम समुदाय को वहां शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की अनुमति देता था। कोर्ट ने माना कि हिंदुओं को वहां पूजा करने का मौलिक अधिकार है और भारत सरकार तथा एएसआई को निर्देश दिया कि वे भोजशाला मंदिर के प्रशासन, संस्कृत शिक्षा के प्रबंधन और भविष्य की व्यवस्था के संबंध में उचित निर्णय लें।
Dhar Bhojshala Controversy: Full FAQ on the Ongoing Matter
प्रश्न 16: लंदन के संग्रहालय में रखी देवी सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा के बारे में क्या मांग की गई थी और कोर्ट का क्या रुख रहा?
उत्तर: हिंदू याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि भारत सरकार कूटनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ब्रिटिश संग्रहालय (London Museum) से देवी वाग्देवी की प्राचीन प्रतिमा को वापस भारत लाए और उसे भोजशाला परिसर में पूरे सम्मान के साथ पुन: स्थापित करे। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता इस संबंध में पहले ही भारत सरकार को अभ्यावेदन (representations) दे चुके हैं, अतः सरकार प्रतिमा को वापस लाने और स्थापित करने के इन आवेदनों पर विचार करे।
प्रश्न 17: क्या भोजशाला के भविष्य के प्रबंधन के लिए किसी 'ट्रस्ट' के गठन का निर्देश दिया गया है?
उत्तर: याचिकाओं में यह मांग की गई थी कि भोजशाला मंदिर के प्रशासन और वहां संस्कृत शिक्षा के प्रबंधन के लिए 'ट्रस्ट एक्ट, 1882' के तहत एक ट्रस्ट का गठन किया जाए। हाई कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में भारत सरकार और एएसआई (ASI) को निर्देश दिया है कि वे भोजशाला मंदिर के मामलों के प्रशासन और वहां संस्कृत शिक्षा के उचित प्रबंधन के संबंध में आवश्यक निर्णय लें।
प्रश्न 18: क्या हाई कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुझाई है?
उत्तर: हाँ, न्यायालय ने पक्षों के बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि मुस्लिम पक्ष (मौलाना कमलुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) धार जिले के भीतर मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन हेतु आवेदन करता है, तो सरकार उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकती है ताकि उनके धार्मिक अधिकारों का सम्मान हो सके।
प्रश्न 19: भोजशाला परिसर के संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी अब किसकी होगी?
उत्तर: न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि भोजशाला परिसर का समग्र प्रशासन और प्रबंधन पूर्व की भांति 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' के प्रावधानों के तहत एएसआई (ASI) के पास ही रहेगा। एएसआई के पास परिसर के संरक्षण, सुरक्षा और वहां धार्मिक पहुंच को विनियमित (regulate) करने का पूर्ण पर्यवेक्षी नियंत्रण होगा।
प्रश्न 20: एएसआई (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के आदेश का अब क्या दर्जा है?
उत्तर: उच्च न्यायालय ने एएसआई के 2003 के उस आदेश को रद्द (quash) कर दिया है जो हिंदुओं के पूजा करने के अधिकार को सीमित करता था और मुस्लिम समुदाय को परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज़ की अनुमति देता था। कोर्ट के अनुसार, यह आदेश स्थल के मूल धार्मिक स्वरूप (मंदिर) के विपरीत था।
Dhar Bhojshala Case Explained
निष्कर्ष: उच्च न्यायालय के इस निर्णय ने भोजशाला के मूल ऐतिहासिक और धार्मिक स्वरूप को 'मंदिर' के रूप में मान्यता दी है और वहां नमाज़ की अनुमति देने वाले पिछले प्रशासनिक आदेशों को अवैध घोषित कर दिया है।

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