नई दिल्ली, 8 मई 2026: वह इतना शातिर था कि, पुलिस डिपार्टमेंट, हाई कोर्ट में उसका अपराध साबित नहीं कर पाया था। हाई कोर्ट ने सबूत नहीं मिलने के कारण उसको बर्खास्त किए जाने का आदेश निरस्त कर दिया था, लेकिन न्यायालय जब न्याय देना चाहता है तो रास्ता निकल आता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा रास्ता निकाला की सबूत अपने आप चलकर कोर्ट रूम के अंदर आ गए।
Big Action: Constable Holding Jobs in Two States Sacked After Fake Records Exposed
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में झारखंड पुलिस के उस सिपाही की सेवा बर्खास्तगी को बहाल कर दिया है, जिसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एक ही समय में झारखंड और बिहार दोनों राज्यों की पुलिस में नौकरी हासिल की थी। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने सबूतों की कमी बताते हुए सिपाही को राहत दी थी।
धोखाधड़ी का अनूठा मामला
मामला रंजन कुमार (प्रतिवादी संख्या 1) से संबंधित है, जिसकी नियुक्ति 18 मई 2005 को झारखंड पुलिस में कांस्टेबल के रूप में हुई थी। रिकॉर्ड के अनुसार, दिसंबर 2007 में जब वह झारखंड पुलिस से दो दिनों की छुट्टी पर था, तब उसने अपनी पहचान छिपाकर 'संतोष कुमार' के नाम से पटना (बिहार) में कांस्टेबल के पद पर दूसरी नौकरी हासिल कर ली। इस जालसाजी के लिए उसने न केवल अपना नाम बदला, बल्कि पिता का नाम भी 'कामता सिंह' से बदलकर 'कामता शर्मा' कर दिया और फर्जी प्रमाण पत्र पेश किए।
हाई कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट
झारखंड पुलिस ने विभागीय जांच के बाद 20 अगस्त 2010 को रंजन कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने इस बर्खास्तगी को सही ठहराया था, लेकिन खंडपीठ ने यह कहते हुए इसे रद्द कर दिया कि बिहार से कोई गवाह पेश नहीं किया गया और यह 'बिना सबूत' का मामला है।
उच्चतम न्यायालय ने खंडपीठ के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस बल में ईमानदारी और अनुशासन सर्वोपरि है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में 'संभावनाओं की प्रबलता' (preponderance of probabilities) का मानक लागू होता है और उच्च न्यायालय को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।
सबूत अपने आप चलकर सुप्रीम कोर्ट रूम के अंदर आ गए
मामले की गहराई तक जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस को स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए थे। 11 अप्रैल 2026 को सौंपी गई रिपोर्ट में फिंगरप्रिंट (उंगलियों के निशान), बायोमेट्रिक रिकॉर्ड और तस्वीरों के फॉरेंसिक मिलान से यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया कि 'रंजन कुमार' और 'संतोष कुमार' एक ही व्यक्ति हैं।
उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं:
बर्खास्ती की बहाली: रंजन कुमार की झारखंड पुलिस से बर्खास्तगी के आदेश को तुरंत बहाल किया गया है।
अनुच्छेद 142 का उपयोग: पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय ने अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए बिहार पुलिस में 'संतोष कुमार' के नाम से जारी नियुक्ति आदेश को भी रद्द कर दिया है।
आपराधिक कार्यवाही: न्यायालय ने बिहार और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश दिया है कि आरोपी के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी और पहचान छिपाने (IPC/BNS के तहत) के लिए आपराधिक जांच शुरू की जाए।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक रोजगार, विशेष रूप से पुलिस सेवा को धोखाधड़ी का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।

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