कर्मचारियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 8 अप्रैल 2026
: कर्मचारियों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विवाद का निपटारा किया है, जो आने वाले कई विवादों के निराकरण का कारण बनेगा। इस मामले के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने VRS NOTICE के महत्व को स्पष्ट कर दिया है। सभी प्रकार के सरकारी और प्राइवेट कर्मचारी एवं वकीलों को यह मामला पढ़ना चाहिए ताकि सही समय पर न्याय के लिए उपयोग किया जा सके। 

Voluntary Retirement Rules Get Clarity as Supreme Court Passes Historic Judgment

इस मामले की शुरुआत यूको बैंक की रायपुर शाखा से हुई, जहाँ एस.के. श्रीवास्तव मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। जुलाई 2010 में बैंक प्रबंधन को मैसर्स भानु रोड कैरियर्स और मैसर्स प्रोग्रेसिव एक्जिम लिमिटेड के खातों में कुछ संदिग्ध लेनदेन का पता चला। 04 अक्टूबर 2010 से पहले, श्रीवास्तव ने बैंक के जनरल मैनेजर (कोलकाता) को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VR) के लिए तीन महीने का नोटिस दिया। 
11 नवंबर 2010 को बैंक के जोनल ऑफिस ने श्रीवास्तव को एक कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) जारी कर संदिग्ध लेनदेन पर स्पष्टीकरण मांगा।
04 जनवरी 2011: श्रीवास्तव द्वारा दिए गए तीन महीने के नोटिस की अवधि इस तारीख को समाप्त हो गई। नियमतः, यदि बैंक को उनकी सेवानिवृत्ति रोकनी थी, तो उसे इसी अवधि के भीतर औपचारिक इनकार करना चाहिए था।
16 मई 2011: बैंक द्वारा कोई स्पष्ट इनकार न मिलने पर, श्रीवास्तव ने अपनी सेवाएं समाप्त कर दीं और काम पर जाना बंद कर दिया। 
बैंक ने काफी समय बाद 29 जून 2011 को उनकी सेवानिवृत्ति याचिका खारिज करने की सूचना दी और 05 मार्च 2012 (सेवानिवृत्ति के 8 महीने बाद) उन्हें आरोप-पत्र जारी कर अंततः सेवा से बर्खास्त कर दिया।

दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क
अपीलकर्ता (यूको बैंक) के तर्क: बैंक के वकील ने 'सर्विस रेगुलेशन 20(3)(ii)' का हवाला देते हुए तर्क दिया कि:
चूंकि 11 नवंबर 2010 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, इसलिए अनुशासनात्मक कार्यवाही "लंबित" मानी जानी चाहिए।
जब कार्यवाही लंबित हो, तो कर्मचारी बिना बैंक की लिखित अनुमति के सेवा नहीं छोड़ सकता और उसकी सेवानिवृत्ति स्वतः प्रभावी नहीं हो सकती।
प्रतिवादी (एस.के. श्रीवास्तव) व एमिकस क्यूरी के तर्क: श्रीवास्तव (जो स्वयं भी पेश हुए) और न्यायालय द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गौरव अग्रवाल (Amicus Curiae) ने दलील दी कि, 'पेंशन रेगुलेशन 29(2)' के तहत, यदि नियुक्ति प्राधिकारी नोटिस अवधि समाप्त होने से पहले इनकार नहीं करता है, तो सेवानिवृत्ति स्वतः (Ipso Facto) प्रभावी हो जाती है।
बैंक ने 4 जनवरी 2011 तक उनकी सेवानिवृत्ति को रोकने का कोई आदेश पारित नहीं किया था।
11 नवंबर 2010 का नोटिस केवल "स्पष्टीकरण" मांगने के लिए था, इसे अनुशासनात्मक कार्यवाही की शुरुआत नहीं माना जा सकता।

न्यायालय की विशेष टिप्पणी

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने बैंक की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
न्यायालय ने कहा कि कारण बताओ नोटिस में केवल "आगे की कार्रवाई की जाएगी" लिखना अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का इरादा नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बैंक को सेवानिवृत्ति रोकने के लिए एक सकारात्मक आदेश (Positive Order) पारित करना अनिवार्य था, जो श्रीवास्तव को नोटिस अवधि के भीतर सूचित किया जाना चाहिए था।

न्यायालय ने माना कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कर्मचारी का एक विशिष्ट अधिकार है और यदि नियम का पालन नहीं किया गया, तो कर्मचारी को नोटिस अवधि की समाप्ति पर सेवानिवृत्त माना जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यूको बैंक की अपीलों को खारिज कर दिया और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें श्रीवास्तव की बर्खास्तगी को अवैध बताया गया था।

मुख्य निर्देश:
एस.के. श्रीवास्तव को नोटिस अवधि की समाप्ति (04.01.2011) से सेवानिवृत्त माना जाए।
बैंक उनके सभी सेवानिवृत्ति लाभ (Post-retiral benefits) तीन महीने के भीतर लागू ब्याज दर के साथ चुकाए।
बैंक द्वारा जारी किया गया आरोप-पत्र और बर्खास्तगी का आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।
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