जबलपुर, 14 अप्रैल 2026: भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली एजेंसी को अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है। उनकी जरा सी गलती सब गुड, गोबर कर देती है। जबलपुर में ऐसा ही हुआ जब रेलवे की विजिलेंस टीम ने भ्रष्टाचार के एक मामले को ठीक प्रकार से पकड़ा तो परंतु कोर्ट में प्रमाणित नहीं कर पाई। नतीजा, बर्खास्त किया गया कर्मचारी बहाल हो गया।
Railway Employee Case: Vigilance Team Failed to Build Strong Case, Couldn’t Defend in Court
रेलवे की विजिलेंस टीम को शिकायत मिली कि, नरसिंहपुर जिले के श्रीधाम रेलवे स्टेशन पर, टिकट काउंटर पर गड़बड़ी की जा रही है। यात्रियों को पूरे पैसे वापस नहीं किए जाते। जांच करने के लिए विजिलेंस टीम के एक कर्मचारी ने 4 जनवरी 2002 को यात्री बनाकर श्री धाम रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर से टिकट खरीदा। टिकट के साथ उनका 31 रुपए वापस मिलने चाहिए थे परंतु टिकट पर बैठे कर्मचारियों ने केवल ₹21 ही वापस किए। शिकायत की पुष्टि होते ही विजिलेंस सी टीम ने टिकट काउंटर पर बैठे कर्मचारियों को पकड़ लिया और उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। पकड़े गए कर्मचारी का नाम श्री नारायण नायर था।
विभागीय जांच के दौरान श्री नायर ने अपने बचाव में कहा कि, यात्रियों की भीड़ अधिक होने के कारण उनसे गलती हो गई होगी। उनका इरादा भ्रष्टाचार नहीं था। विजिलेंस की टीम ने उनके पास से ₹450 नगद जप्त किए थे परंतु टीम ने ना तो कोई हिसाब मांगा था और ना ही श्री नायर की ओर से विजिलेंस टीम को इसके बारे में कोई जानकारी दी गई थी। विभागीय जांच में श्रीनगर ने कहा कि, यह पैसा बीमार पत्नी के लिए दवा खरीदने हेतु लाया था। इसके अलावा विजिलेंस की टीम ने श्री नायर के पास से एक अतिरिक्त टिकट रोल भी जप्त किया था। विभागीय जांच में श्री नायर ने कहा कि टिकट का कोई बंडल नीचे पड़ा हुआ था, उनको उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
डिपार्टमेंटल इंक्वारी कर रहा है अधिकारी श्री नायर के बयान से संतुष्ट नहीं हुए और उनको बर्खास्त कर दिया गया। जाना कि विभागीय जांच भी पूरी नहीं की गई। जांच में यह पता नहीं किया गया कि, जो 450 रुपए नगद उनके पास से जब हुए हैं, क्या वह सचमुच पत्नी की दवाई के लिए थे। क्या सचमुच उनकी पत्नी बीमार थी। क्या वह प्रमाणित कर सकते हैं कि, जो बयान वह दे रहे हैं वह सही है। क्या कोई स्वतंत्र गवाह है जो बता सकता है कि उनकी जेब में जो 450 रुपए रखे थे, वह उनके टिकट काउंटर में आने से पहले भी उनकी जेब में थे।
विभागीय जांच में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि नीचे जो टिकट का बंडल मिला था, वह यदि श्री नायर का नहीं था, तो किसका था। यदि किसी दूसरे कर्मचारियों का नहीं था तो फिर अन्य कर्मचारियों के बयान के आधार पर प्रमाणित होना चाहिए था कि वह श्री नायर का था। लेकिन विभागीय जांच में अतिरिक्त टिकट का बंडल लावारिस रह गया।
नतीजा यह हुआ की 24 साल चली लंबी लड़ाई के बाद भी रेलवे की विजिलेंस टीम, साबित नहीं कर पाई की श्री नायर भ्रष्टाचार कर रहे थे। हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा अपने फैसले में कहा गया कि सिर्फ ₹10 की भ्रष्टाचार के लिए, जबकि भ्रष्टाचार साबित भी नहीं हो पा रहा है, केवल शक के आधार पर कर्मचारी को बर्खास्त कर देना ठीक नहीं है। हाईकोर्ट ने श्री नायर को बहाल कर दिया है।
एक गड़बड़ी यह भी कर दी
इस मामले में जो जांच अधिकारी था वही अभियोजन पक्षी भूमिका निभा रहा था। इस प्रकार अभियोजन के नियम तोड़े गए और प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया। इस बात का फायदा आरोपी कर्मचारी को मिला। इससे पहले ट्रिब्यूनल ने भी श्री नायर को निर्दोष घोषित करते हुए, उनको टर्मिनेट किया जाने के ऑर्डर निरस्त कर दिए थे।
अब देखना यह है कि, रेलवे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करता है या फिर फैसले को स्वीकार करके हार मान लेता है।

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