MP Politics: मंत्री प्रतिमा बागरी की जाति क्या है, अनुसूचित या राजपूत? हाई कोर्ट का ऑर्डर 60 दिन में बताओ

Updesh Awasthee
HC Seeks Report on Pratima Bagri
जबलपुर, 24 अप्रैल 2026
: सगे भाई द्वारा तस्करी किए जाने के मामले में विवादित बयान देने वाली मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार में नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी (Minister Pratima Bagri) के नाम पर एक और नया विवाद जुड़ गया है। उनके जाति प्रमाण पत्र को लेकर सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने मामले की जांच का जिम्मा 'हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी' (High-Level Caste Scrutiny Committee) को सौंप दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कमेटी निर्धारित प्रक्रिया के तहत 60 दिनों के भीतर इस प्रमाण पत्र की वैधता पर अपना अंतिम निर्णय ले।

कांग्रेस की घेराबंदी: "राजपूत होकर SC कोटे से जीता चुनाव"

इस पूरे मामले का खुलासा भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार (Pradip Ahirwar), जो इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता भी हैं, ने मंत्री प्रतिमा बागरी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अहिरवार का दावा है कि प्रतिमा बागरी वास्तव में राजपूत/ठाकुर समुदाय से संबंध रखती हैं, लेकिन उन्होंने गलत तरीके से अनुसूचित जाति (SC) का प्रमाण पत्र बनवाकर आरक्षण का अनुचित लाभ लिया। याचिका के अनुसार, इसी 'फर्जी' प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट (जो SC वर्ग के लिए आरक्षित है) से चुनाव जीता और वर्तमान में मंत्री पद पर काबिज हैं।

ऐतिहासिक दस्तावेजों और जनगणना का हवाला

कोर्ट के समक्ष पेश की गई याचिका में याचिकाकर्ता ने अपने दावों की पुष्टि के लिए कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों का आधार लिया है:
याचिका में तर्क दिया गया है कि 1961 और 1971 की जातिगत जनगणनाओं के रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित क्षेत्र में 'बागरी' जाति अनुसूचित जाति की सूची में नहीं आती।
याचिकाकर्ता ने 2007 के सेंट्रल गजट और 2003 की राज्य स्तरीय छानबीन समिति के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि 'बागरी' को संबंधित क्षेत्र में SC श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख और Deadline

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे ठंडे बस्ते में डालने के बजाय एक निश्चित समयसीमा तय कर दी है।
30 अप्रैल 2026 तक: दोनों पक्षों को हाईकोर्ट के आदेश की प्रति स्पीड पोस्ट के जरिए स्क्रूटनी कमेटी को भेजनी होगी।
30 जून 2026 तक: कमेटी को हर हाल में अपनी जांच पूरी कर निर्णय लेना होगा।
याचिका का पुनर्जीवन: कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि कमेटी 30 जून तक कोई फैसला नहीं लेती है, तो याचिकाकर्ता को इस केस को फिर से 'रिवाइव' (Revive) कराने की पूरी स्वतंत्रता होगी।

सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित शासकीय अधिवक्ता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सक्षम प्राधिकारी (High Level Caste Scrutiny Committee) नियमानुसार जांच करेगी। कमेटी प्रतिवादी (मंत्री प्रतिमा बागरी) को भी सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करेगी और जांच के बाद उचित आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को इसकी सूचना देगी।

Pratima Bagri Caste Row: High Court Orders Status Report in 60 Days

यदि हाई लेवल कमेटी की जांच में मंत्री का प्रमाण पत्र अवैध पाया जाता है, तो यह न केवल प्रतिमा बागरी की विधायकी के लिए खतरा पैदा करेगा, बल्कि मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बड़ा संकट भी खड़ा कर सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें 30 जून की समयसीमा पर टिकी हैं।
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