इंदौर, 7 अप्रैल 2026: मध्य प्रदेश शासन के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए आयोजित संयुक्त भर्ती परीक्षा 2024 का टॉपर कैंडिडेट, इस सफलता के मद में इतना चूर हो गया कि, 'मेरिट-कम-प्रिफरेंस' (योग्यता और प्राथमिकता) के सिद्धांत को चुनौती दे डाली। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि मैं टॉपर हूं, जिस पोस्ट पर चाहूंगा उसे पोस्ट पर मुझे नियुक्ति मिलनी चाहिए। हाई कोर्ट ने उसकी याचिका को "तुच्छ मुकदमेबाजी" कहकर खारिज कर दिया।
High Court Dismisses MPESB G4-SG-3 Topper’s Plea as Frivolous Litigation
याचिकाकर्ता जितेंद्र मेवाड़ा ने मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (Respondent No.3/ESB) द्वारा आयोजित "ग्रुप-4, सहायक ग्रेड-3 संयुक्त भर्ती परीक्षा-2024" में भाग लिया था। जितेंद्र एक उच्च शिक्षित उम्मीदवार हैं, जिनके पास कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा (DCA), बी.एससी. (कंप्यूटर साइंस), और स्टेनो-टाइपिस्ट की योग्यता है। ऑनलाइन आवेदन भरते समय, याचिकाकर्ता ने विभिन्न पदों के लिए अपनी प्राथमिकता (Preference) दर्ज की थी। उन्होंने पोस्ट कोड 144 (सहायक ग्रेड-III-सह-स्टेनो टाइपिस्ट) को अपनी पहली पसंद (1st preference) के रूप में चुना था। वहीं, पोस्ट कोड 83 (सहायक ग्रेड-III, कार्यालय आयुक्त भू-अभिलेख) को उन्होंने अपनी सूची में 36वें स्थान पर रखा था।
परीक्षा परिणाम में याचिकाकर्ता ने 99.927273 पर्सेंटाइल के साथ बहुत उच्च मेरिट प्राप्त की और उन्हें उनकी पहली पसंद (पोस्ट कोड 144) आवंटित कर दी गई। लेकिन जितेंद्र ने बाद में अपनी पसंद बदल दी। उन्होंने पोस्टकार्ड 83 के आवंटन की मांग की। जब एम्पलाइज सिलेक्शन बोर्ड भोपाल ने ऐसे किसी भी प्रावधान के होने से इनकार कर दिया तो श्री जितेंद्र मेवाड़ा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके पोस्ट कोड 83 के लिए चयनित उन उम्मीदवारों (प्रतिवादी संख्या 4 और 5) की नियुक्ति को चुनौती दी। श्री जितेंद्र मेवाड़ा का कहना है कि वह टॉपर हैं और परीक्षा में उपलब्ध सभी पदों के लिए उनका पहला अधिकार बनता है।
दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील - श्री एल.सी. पाटणे ने तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता की मेरिट कम अंक वाले उम्मीदवारों से अधिक है, इसलिए उसे उसकी पसंद के क्रम की परवाह किए बिना पोस्ट कोड 83 मिलना चाहिए था। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने प्राथमिकता क्रम 'अनजाने में' (randomly) भर दिया था और केवल इस तकनीकी आधार पर उसे बेहतर पद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि योग्यता (Merit), व्यक्तिगत पसंद से ऊपर होनी चाहिए।
कर्मचारी चयन बोर्ड के वकील - श्री मनु माहेश्वरी ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पूरी आवंटन प्रक्रिया 'मेरिट-कम-प्रिफरेंस' के वैधानिक नियमों पर आधारित है। चूंकि याचिकाकर्ता सर्वोच्च मेरिट में थे, इसलिए सॉफ्टवेयर ने उन्हें उनकी सबसे पहली पसंद का पद आवंटित किया। तर्क दिया गया कि यदि इस स्तर पर बदलाव किया गया, तो यह 57 विभागों और 117 पोस्ट कोड की पूरी चयन सूची को अस्त-व्यस्त कर देगा, जिससे प्रशासनिक अराजकता पैदा होगी।
न्यायालय की विशेष टिप्पणी
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने मामले का विश्लेषण करते हुए कई कड़ी टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि प्राथमिकता सूची को "बेतरतीब ढंग से" (randomly) भरने का याचिकाकर्ता का तर्क उनकी "घोर लापरवाही" (sheer negligence) को दर्शाता है, जिसे कानूनी आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने स्वयं खेल के नियमों को स्वीकार किया और अपनी पसंद लॉक की थी, इसलिए अब वह अपनी ही दी हुई पसंद को चुनौती नहीं दे सकते। इसको विबंधन का सिद्धांत (Doctrine of Estoppel) कहते हैं।
तुच्छ मुकदमेबाजी
कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि एक उम्मीदवार को उसकी 1st पसंद छोड़कर 36वीं पसंद चुनने की अनुमति दी गई, तो इससे एक "विनाशकारी डोमिनो इफेक्ट" शुरू हो जाएगा, जिससे हजारों अन्य उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होंगे। अदालत ने चयन बोर्ड को भविष्य के विज्ञापनों में 'मेरिट-कम-प्रिफरेंस' सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को और अधिक विस्तार से समझाने की सलाह दी ताकि ऐसी "तुच्छ मुकदमेबाजी" को रोका जा सके।
न्यायालय का निर्णय
उच्च न्यायालय ने जितेंद्र मेवाड़ा की याचिका को पूरी तरह से सारहीन और योग्यता विहीन मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारी चयन बोर्ड ने प्रकाशित वैधानिक नियमों के भीतर रहकर ही कार्य किया है और याचिकाकर्ता को उसकी योग्यता के अनुसार उसकी सर्वोच्च पसंद का पद देकर उसे उचित रूप से पुरस्कृत किया गया है।

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