मध्य प्रदेश की महिला अतिथि विद्वानों के लिए बड़ी खबर, मातृत्व अवकाश को लेकर हाईकोर्ट का अहम फैसला

Updesh Awasthee
जबलपुर, 8 अप्रैल 2026
: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता श्रीमती प्रीति साकेत बनाम मध्य राज्य में विधि जगत में अहम् फैसला पारित कर मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधानों की तार्किक तथा संविधान सम्मत व्याख्या करके व्यवस्था दी गई है कि मातृत्व अवकाश का लाभ प्राप्त करने हेतु '12 महीनों में 80 दिन कार्य करने' की शर्त, राज्य सरकार के अधीन कार्यरत संस्थानों पर लागू नहीं होगी। 

MP High Court Gives Key Verdict on Maternity Leave for Women Guest Faculty

मामला यह है कि याचिकाकर्ता श्रीमती प्रीति साकेत गवर्नमेंट तिलक PG कॉलेज कटनी में अतिथि विद्वान के रूप में नियोजित की गई जिसे दिनांक 05.04.2023 को तत्कालीन प्रिंसिपल द्वारा छह महीने के लिए मैटरनिटी लीव दी गई थी और इस दौरान, पिटीशनर को मानदेय भी दिया जाए, यह आदेश भी जारी किया था। उक्त कालेज में दूसरे प्रिंसिपल द्वारा बाद में, उक्त आदेश दिनांक 05.04.2023 में संशोधन करके दिनांक 16.06.2023 को दूसरा आदेश पारित करके उक्त छह महीने के लिए मैटरनिटी लीव अवैतनिक कर दी गई। प्रिंसिपल द्वारा पारित संशोधित आदेश 16.06.2023 की संवैधानिकता को आर.पी.एस.ला एसोसिएट के माध्यम से चुनोती दी गई। याचिका की प्रारंभिक सुनवाई न्यायमूर्ति श्री विशाल धगट की खंडपीठ द्वारा की गई। 

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की विस्तृत व्याख्या 

याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, हितेंद्र कुमार गोल्हानी, काजल विश्वकर्मा ने उक्त संशोधित आदेश को कानून की नज़र में गलत बताया गया तथा हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के संबंध में की गई विस्तृत व्याख्या के आदेश, जिसमे संविधान के भाग तीन में निहित मौलिक अधिकारों को मातृत्व अवकाश के क़ानून से जोड़कर की गई व्याख्या से अवगत कराया गया गया। 

कॉलेज प्रिंसिपल के खिलाफ जातिवाद का आरोप भी लगाया

कोर्ट को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता को इसलिए प्रताड़ित और परेशान किया जा रहा है क्योंकि वह अनुसूचित जाति से संबंधित है, जबकि इसी प्रिंसिपल द्वारा अन्य सामान्य महिलाओं को याचिकाकर्ता जैसे प्रकरण में लाभ दिया गया है। इस संबंध में याचिकाकर्ता ने SC और ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1) के तहत उक्त अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अभ्यावेदन भी दिया है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इसी के मद्देनज़र, यह प्रार्थना की जाती है कि विवादित आदेश को रद्द किया जाए और याचिकाकर्ता को पहले के आदेश के अनुसार, पारिश्रमिक (मानदेय) सहित मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाए।  

मातृत्व अवकाश के मामले में हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

प्रिंसिपल द्वारा पारित संशोधित आदेश को हाईकोर्ट ने निरस्त करते हुए इसे घोर असंवैधानिक मानकर व्याख्या की गई कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के ढांचे तथा भारत के संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए, यह कहा जा सकता है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है। राज्य का कर्तव्य है कि वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करे। सामाजिक न्याय के अंतर्गत स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़े उपाय शामिल हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 38 के अनुसार, राज्य लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा; वहीं संविधान के अनुच्छेद 39 में यह प्रावधान है कि राज्य अपनी नीतियों का निर्धारण इस प्रकार करेगा जिससे श्रमिकों, चाहे वे पुरुष हों या महिलाएँ, और विशेष रूप से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता की रक्षा सुनिश्चित हो सके। 

इसके अतिरिक्त, भारत के संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत, राज्य के लिए यह भी अनिवार्य है कि वह सभी नागरिकों को समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराए। उपर्युक्त 'नीति-निर्देशक सिद्धांत' राज्य सरकार को अपनी नीतियाँ बनाने के संबंध में दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। संवैधानिक न्यायालय द्वारा भारत के संविधान की मूल भावना और इन नीति-निर्देशक सिद्धांतों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वर्ष 1961 के अधिनियम की धारा 5(2) के अंतर्गत, मातृत्व अवकाश का लाभ केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब संबंधित महिला ने पिछले 12 महीनों के दौरान कम से कम 80 दिन कार्य किया हो; अन्यथा इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है। 

हाई कोर्ट का फैसला: जातिवाद नहीं लेकिन वेतन तो देना होगा

परंतु, मातृत्व अवकाश का लाभ प्राप्त करने हेतु '12 महीनों में 80 दिन कार्य करने' की यह शर्त, राज्य सरकार के अधीन कार्यरत संस्थानों पर लागू नहीं होगी। राज्य का यह दायित्व है कि वह अपने नागरिकों के कल्याण हेतु आवश्यक उपाय सुनिश्चित करे। तथा  प्रिंसिपल, गवर्नमेंट तिलक PG कॉलेज, कटनी द्वारा पारित आदेश दिनांक 16.06.2023 को रद्द किया जाता है और पिटीशनर को मैटरनिटी लीव का फायदा देने का निर्देश दिया जाता है। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(1) के अनुसार. याचिकाकर्ता 26 सप्ताह की सवेतन छुट्टी की हकदार होगी।
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