गौरैया चिड़िया के कारण अकाल पड़ गया था, ढाई करोड़ लोग मर गए थे - World Sparrow Day

Updesh Awasthee
आपको तो पता ही होगा, हम हर साल बताते हैं लेकिन बात ही कुछ ऐसी है। इसको हर साल दोहराया जाना चाहिए ताकि पीढ़ियों तक याद रहे और हमारे आने वाली संताने ऐसी कोई गलती ना करें। इसलिए याद रखना जरूरी है कि आज से सिर्फ 60 साल पहले गौरैया चिड़िया के खत्म हो जाने के कारण अकाल पड़ गया था और ढाई करोड़ लोग मर गए थे। 

चीन में 1966 के अकाल की कहानी

बात 1958 की है जब चीन के "माओ जेडोंग" ने चीन में एक अभियान शुरू करवाया था जिसे four pests campaign का नाम दिया गया था। जिसमें मच्छर-मक्खी, चूहा और गौरैया चिड़िया को मारने का फरमान जारी किया गया। उनका कहना था कि गौरैया खेतों से सारा अनाज खा जाती है इसलिए इसे भी मारना जरूरी है। मच्छर, मक्खी और चूहे के नुकसान तो सबको ही पता हैं कि मच्छर मलेरिया फैलाते हैं, मक्खियां हैजा फैलाती हैं और चूहे प्लेग फैलाते हैं। चीन के वैज्ञानिकों का मानना था कि इनका सफाया करना ही इंसानों के हित में है। 

निर्दयी और क्रूर राष्ट्रवाद

चीन में वह राष्ट्रवाद का समय था, उस समय कथित देशभक्त क्रांतिकारियों ने जनता के बीच में इस अभियान को एक आंदोलन की तरह चलाया। लोग बर्तन व ड्रम बजा बजाकर चिड़ियों को उड़ाते रहते और लोगों की पूरी कोशिश होती कि चिड़ियों को खाना ना मिले और बैठने की जगह ना मिले। इससे गौरैया कब तक उड़ती आखिर थक कर गिर जाती और उसे मार दिया जाता।

इसी प्रकार ढूंढ-ढूंढ कर उनके अंडों को फोड़ दिया गया और चिड़िया व उसके छोटे-छोटे बच्चों को भी क्रूरता का शिकार होना पड़ा। हालत यह थी कि जो शख्स जितनी गौरैया को मारता उसे स्कूल, कॉलेज के आयोजनों में मेडल और इनाम दिए जाते।

गौरैया चिड़िया को यह बात समझ आ गई थी कि अब उनके लिए कोई भी सुरक्षित जगह नहीं है इसलिए एक बार बहुत सारी गौरैया झुंड बनाकर पोलैंड के दूतावास में जा छूपी, परन्तु गौरैया को मारने वाले वहां भी पहुंच गए और उनके सिर पर खून सवार था उन्होंने दूतावास को घेर लिया और इतने ड्रम बजाए कि उड़ते-उड़ते थक करके सारी गौरैया गिर कर मर गईं।

अब चीन के लोग खुश थे कि उनका अनाज खाने वाली गौरैया से छुटकारा मिल गया है और अब अनाज सुरक्षित रहेगा परंतु क्या अनाज सुरक्षित रहा, नहीं बल्कि उल्टा हो गया। अगले दो साल आते-आते 1960 तक लोगों को समझ आ चुका था कि उनसे कितनी बड़ी गलती हो गई है। गौरैया अनाज नहीं खाती थी, बल्कि फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाती थी। गौरैया चिड़िया के कारण अनाज सुरक्षित था। गौरैया चिड़िया को मार दिया गया तो, अनाज की पैदावार उतनी भी नहीं हुई जितनी 1958 में होती थी। अनाज की पैदावार कम होती चली गई। खेतों में फसल तो खड़ी थी लेकिन दाने नहीं थे, क्योंकि कीड़े, फसलों के दाने खा रहे थे और कीड़ों को खाने वाली गौरैया चिड़िया गायब हो चुकी थी। 

गौरैया के मर जाने से नतीजा यह हुआ कि धान की पैदावार बढ़ने की बजाय, तेजी से घटने लगी। टिड्डी और दूसरे कीड़ों की तादाद तेजी से बढ़ने लगी और उनकी आबादी पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया। फसलें खराब हो गईं और बुरी तरह से अकाल पड़ गया और इस अकाल में ढाई करोड़ लोग मारे गए। 

60 साल पुरानी कहानी अब सुनाने की क्या जरूरत है 

कोई विद्वान यह सवाल कर सकता है कि, 60 साल पहले चीन में जो हुआ था वह कहानी आज 2026 में भारत में सुनने की क्या जरूरत है। कृपया ऐसे लोगों को बताइए- चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने 60 साल पहले गौरैया चिड़िया के बारे में जो प्रचार किया था " गौरैया अनाज के दाने खाती है" भारत में आज भी करोड़ों किसान इस बात पर विश्वास करते हैं। जब उनके खेत में गौरैया चिड़िया जाकर कीड़ों को खाना शुरु करती है तो वह पत्थर मार कर चिड़ियों को भगा देते हैं। चीन के माओ जेडोंग को तो 4 साल में यह बात समझ में आ गई थी, लेकिन भारत के किसानों को 60 साल बाद भी समझ में नहीं आई है। इसलिए कृपया इस आर्टिकल को किसानों और उनकी संतानों के साथ शेयर कीजिए। साथ में उन लोगों के साथ भी शेयर कीजिए जो राष्ट्रवाद के नाम पर अंधे हो जाते हैं।

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