नई दिल्ली/ ग्वालियर, 9 मार्च 2026: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गोबिंद सिंह (ग्वालियर) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (सिविल अपील संख्या 5168-5169/2011) के मामले में एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि, यदि किसी जमीन पर किसी व्यक्ति का 50 साल पुराना कब्ज है, लेकिन कब्जे के आधार पर उसकी जमीन का मालिक घोषित नहीं किया जा सकता।
मामले की पूरी कहानी: विवाद की जड़ें
यह विवाद ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के परगना और जिला ग्वालियर के अंतर्गत पटवारी हल्का नंबर 51, मुरार में बाज़ सिनेमा हॉल के सामने स्थित सर्वे नंबर 2029 की भूमि से संबंधित है, जिसका क्षेत्रफल 8 बीघा और 10 बिस्वा है। विवाद की शुरुआत 4 दिसंबर, 1989 को हुई, जब भारत सरकार (रक्षा मंत्रालय) के अधिकारियों ने उक्त भूमि पर लगी तारबंदी, दो दुकानों और खड़ी फसलों को हटाने का प्रयास किया। इसके जवाब में, गोबिंद सिंह और अन्य (अपीलकर्ता) ने 5 दिसंबर, 1989 को ग्वालियर के सिविल कोर्ट में मालिकाना हक घोषित करने और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए मुकदमा (सिविल सूट नंबर 5-A/1990) दायर कर दिया।
न्यायिक यात्रा: ट्रायल कोर्ट से सर्वोच्च न्यायालय तक
ट्रायल कोर्ट (1996): ग्वालियर के 5वें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने 25 मार्च, 1996 को अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि भूमि पर उनका कब्जा है और सरकार अपना स्वामित्व साबित करने में विफल रही है।
उच्च न्यायालय (2009-2011): भारत संघ ने इस फैसले को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर खंडपीठ) में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने 12 अगस्त, 2009 को निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए अपीलकर्ताओं के दावे को खारिज कर दिया। बाद में 15 मार्च, 2011 को उनकी समीक्षा याचिका (Review Petition) भी खारिज कर दी गई।
सर्वोच्च न्यायालय (2026): अंततः मामला देश की शीर्ष अदालत पहुँचा, जहाँ न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया।
दोनों पक्षों के मुख्य तर्क
अपीलकर्ताओं (गोबिंद सिंह और अन्य) का पक्ष:
- यह उनकी पैतृक संपत्ति है और उनके पूर्वज पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से इस पर काबिज हैं।
- उन्होंने तर्क दिया कि 9 जुलाई, 1984 को एक सक्षम न्यायालय ने पहले ही उनके पूर्वजों के पक्ष में डिक्री पारित की थी, जो अब अंतिम है।
- उन्होंने प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के माध्यम से मालिकाना हक प्राप्त करने का दावा भी किया।
- अपील के दौरान उन्होंने जनरल लैंड रजिस्टर (GLR) के दस्तावेजों को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में रखने की अनुमति मांगी ताकि यह साबित हो सके कि भूमि निजी दर्ज है।
प्रतिवादियों (भारत संघ/रक्षा मंत्रालय) का पक्ष:
- यह भूमि 'मुरार छावनी' (Morar Cantonment) का हिस्सा है। 17 जुलाई, 1953 को राज्य सरकार से केंद्र सरकार को स्वामित्व हस्तांतरित होने के बाद यह भूमि भारत संघ में निहित हो गई थी।
- 4 नवंबर, 1954 का मध्य भारत का राजपत्र (Gazette Notification) भी इस बात की पुष्टि करता है।
- 1984 की जिस डिक्री का अपीलकर्ता हवाला दे रहे हैं, वह एकपक्षीय (Ex-parte) थी और उसमें भारत संघ को पक्षकार नहीं बनाया गया था, इसलिए वह उन पर बाध्यकारी नहीं है।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि: 1984 की पुरानी डिक्री भारत संघ पर बाध्यकारी नहीं है क्योंकि उन्हें (भारत सरकार को) उस मुकदमे में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि उनके पूर्वजों को यह जमीन किस आधार पर और कब मिली थी। केवल लंबे समय तक कब्जा होने से राज्य के विरुद्ध मालिकाना हक नहीं मिल जाता।
अतिरिक्त साक्ष्य: न्यायालय ने अतिरिक्त साक्ष्य (Order XLI Rule 27 CPC) प्रस्तुत करने की उनकी मांग को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि इसका उद्देश्य केवल अपनी कानूनी कमियों को भरना था। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि की और अपीलकर्ताओं की अपीलों को खारिज कर दिया।
विशेष तथ्य: याचिकाकर्ताओं के आचरण पर कड़ी फटकार
न्यायालय ने अपीलकर्ताओं के आचरण पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ताओं ने असली मालिक (भारत संघ) की पीठ पीछे डिक्री हासिल करने की कोशिश की थी। विशेष रूप से यह उल्लेख किया गया कि अपीलकर्ता नंबर 1, गोबिंद सिंह, उस समय कमिश्नर कार्यालय में कार्यरत थे, और एकपक्षीय डिक्री के तुरंत बाद राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराना उनके इरादों पर संदेह पैदा करता है। न्यायालय ने उन्हें "अनुचित वादी" (unscrupulous litigants) करार दिया।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी भी जमीन पर यदि किसी व्यक्ति का लंबे समय तक कब्जा है अथवा उसने न्याय की प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई कानूनी डिक्री हासिल कर ली है तो उसके आधार पर उसकी संपत्ति या जमीन का स्वामी घोषित नहीं किया जा सकता।

.webp)