बच्चों को गोद लेने वाली महिला कर्मचारियों के लिए सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 की धारा 60-4 में संशोधन

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 18 मार्च 2026
: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने बच्चों को गोद लेने वाली महिला कर्मचारियों के लिए ऐतिहासिक फैसला दिया है। इसी के साथ सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020' की धारा 60(4) की परिभाषा में भी संशोधन किया है। दिनांक 17 मार्च 2026 के बाद सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020' की धारा 60(4) की नई परिभाषा को प्रभावशाली माना जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं बच्चों को गोद लेने वाले पिताओं के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं।

Supreme Court Expands Rights of Adoptive Women Employees

हंसनंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ एवं अन्य (Hamsaanandini Nanduri vs. Union of India & Ors.) मामले का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है। यह एक ऐतिहासिक मामला है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने दत्तक माताओं (adoptive mothers) के मातृत्व लाभ के अधिकारों की रक्षा की है। मामले की पहचान और संदर्भ:-
  • केस का नाम: हंसनंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ एवं अन्य
  • याचिका संख्या: रिट याचिका (सिविल) नंबर 960/2021
  • न्यायालय: भारत का उच्चतम न्यायालय (मूल नागरिक अधिकार क्षेत्र)
  • फैसले की तारीख: 17 मार्च, 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन

पूरी कहानी: विवाद का विषय और संदर्भ

यह याचिका हंसनंदिनी नंदूरी द्वारा सार्वजनिक हित में (PIL) दायर की गई थी, जो स्वयं दो बच्चों की दत्तक माता हैं। उन्होंने 'मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961' (Maternity Benefit Act, 1961) की धारा 5(4) को चुनौती दी थी, जिसे 2017 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। बाद में, जब 'सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020' (Social Security Code, 2020) लागू हुआ, तो इस चुनौती को उसकी धारा 60(4) तक विस्तारित किया गया, क्योंकि दोनों प्रावधानों की भाषा समान थी।

विवादित प्रावधान: 

कानून के अनुसार, केवल उन माताओं को 12 सप्ताह का मातृत्व लाभ (वेतन सहित छुट्टी) मिलता था, जो तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेती थीं। यदि बच्चा तीन महीने से एक दिन भी बड़ा होता, तो मां को कोई मातृत्व लाभ नहीं मिलता था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह आयु सीमा मनमानी, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील: सुश्री बनी दीक्षित की दलील

अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: उन्होंने तर्क दिया कि विधायिका ने दत्तक माताओं के बीच एक कृत्रिम और अतार्किक वर्गीकरण किया है। तीन महीने से कम और तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली माताओं के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं है जो इस भेदभाव को उचित ठहरा सके। प्रावधान इस तथ्य की अनदेखी करता है कि तीन महीने से बड़े बच्चे को भी अपने नए परिवार में घुलने-मिलने (integration) और माँ के साथ भावनात्मक जुड़ाव (bonding) के लिए देखभाल की उतनी ही आवश्यकता होती है।

उन्होंने दलील दी कि भारत में 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' और 'कारा (CARA) रेगुलेशन' के तहत किसी बच्चे को गोद लेने के लिए "कानूनी रूप से मुक्त" घोषित करने में ही कम से कम 2 से 3 महीने लग जाते हैं। ऐसे में, व्यावहारिक रूप से तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेना लगभग असंभव है, जिससे यह कानून कागजों तक ही सीमित (otiose) रह जाता है।

यह सीमा कामकाजी महिलाओं को गोद लेने के प्रति हतोत्साहित करती है। 

प्रतिवादी/सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल: श्री के.एम. नटराज की दलील

उन्होंने तर्क दिया कि जिला मजिस्ट्रेटों को गोद लेने के आदेश जारी करने की शक्ति दी गई है ताकि प्रक्रिया तेज हो सके। 
यदि बच्चा तीन महीने से बड़ा है, तो माताएं सोशल सिक्योरिटी कोड की धारा 67 के तहत कार्यस्थल पर उपलब्ध क्रेच (creche) सुविधाओं का लाभ उठा सकती हैं।
तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को "गहन निर्भरता" (intensive dependency) की आवश्यकता होती है (जैसे दूध पिलाना, सोने का नियमन आदि), जो बड़े बच्चों के मामले में उतनी गंभीर नहीं होती।
यह प्रावधान नियोक्ताओं (employers) के हितों और माताओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाता है।

न्यायाधीशों की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

न्यायालय ने इस मामले में मातृत्व और बचपन के मानवीय पहलुओं पर गंभीर टिप्पणी की:
न्यायाधीशों ने कहा कि माँ बनना केवल कानूनी औपचारिकता पूरी करना नहीं है, बल्कि यह एक क्रमिक प्रक्रिया है जो माँ के दिल में विकसित होती है। मातृत्व को केवल 'जीवविज्ञान' (biology) के संकीर्ण चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने शोध का हवाला देते हुए कहा कि अनाथालयों में रहने वाले बच्चों में तनाव का स्तर अधिक होता है। उन्हें नए परिवार में अपनाने के लिए समय और निरंतर देखभाल की आवश्यकता होती है, चाहे उनकी उम्र जो भी हो।
कोर्ट ने 'वॉल्स्टनक्राफ्ट डिलेमा' (Wollstonecraft Dilemma) का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज अक्सर महिलाओं के बिना वेतन वाले देखभाल कार्य (unpaid care work) की अनदेखी करता है, जो अर्थव्यवस्था की नींव है।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि बच्चे के विकास में पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है और पितृत्व अवकाश की कमी लैंगिक भेदभाव को बढ़ाती है। 

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला 

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार किया और 'सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020' की धारा 60(4) के उस हिस्से को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जो मातृत्व लाभ के लिए बच्चे की आयु "तीन महीने से कम" होने की शर्त रखता था।

न्यायालय के फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • न्यायालय ने माना कि मातृत्व लाभ का उद्देश्य "मातृत्व" (Motherhood) का सम्मान करना है, न कि केवल प्रसव की जैविक प्रक्रिया का। तीन महीने से कम और तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली माताओं के बीच किया गया अंतर किसी भी तर्कसंगत उद्देश्य को पूरा नहीं करता और यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माँ बनने का निर्णय और तरीका (चाहे जैविक हो या गोद लेना) महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का हिस्सा है। बच्चे की उम्र के आधार पर लाभ से वंचित करना अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन है।
  • कोर्ट ने पाया कि भारत में कानूनी रूप से गोद लेने की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि बच्चा मिलने तक वह शायद ही कभी तीन महीने से छोटा रहता है। अतः यह प्रावधान अपने उद्देश्य में ही विफल (illusory) था।

Amendment in Social Security Code 2020 to Expand Benefits for Adopting Women Employees

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अब से 'सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020' की धारा 60(4) को "सार्थक रूप से" (meaningfully) इस प्रकार पढ़ा जाएगा:
"एक महिला जो कानूनी रूप से किसी बच्चे को गोद लेती है या एक 'कमीशनिंग मदर' (सरोगेसी के मामले में), वह बच्चा सौंपे जाने की तारीख से बारह (12) सप्ताह के मातृत्व लाभ की हकदार होगी।"
इस बदलाव का अर्थ यह है कि अब बच्चे की उम्र की कोई भी सीमा (जैसे तीन महीने) लागू नहीं होगी। कानूनी रूप से गोद लिया गया बच्चा चाहे किसी भी उम्र का हो, माँ को 12 सप्ताह का सवैतनिक अवकाश (paid leave) मिलेगा।

पितृत्व अवकाश पर महत्वपूर्ण निर्देश

अपने फैसले के अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने केवल माताओं तक ही सीमित न रहकर, बच्चों के विकास में पिताओं की भूमिका को भी रेखांकित किया। न्यायालय ने केंद्र सरकार (Union of India) से आग्रह किया कि वह "पितृत्व अवकाश" (Paternity Leave) को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए उचित कानून या प्रावधान बनाने पर विचार करे।

निष्कर्ष: इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने महिला कर्मचारी के पक्ष और सरकार अथवा नियुक्ति के पक्ष के स्थान पर"सर्वोत्तम हित" (Best Interest of the Child) के सिद्धांत को सर्वोपरि माना। जबकि बच्चा तो इस केस में पार्टी भी नहीं था। यह जजमेंट भारतीय न्याय व्यवस्था के मार्ग में एक प्रमुख लैंडमार्क की तरह स्थापित रहेगा।
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!