मध्य प्रदेश में कलेक्टरों के हाथ से एक और अधिकार छीन लिया गया, Kissing up to leaders का नतीजा

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 28 मार्च 2026
: कहते हैं कि कलेक्टर जिले का राजा होता है, सबसे पावरफुल व्यक्ति होता है। सभी प्रकार के अधिकार उसके पास होते हैं लेकिन लगता है कि यह बात अब पुरानी हो जाएगी। नेताओं को खुश करने में व्यस्त कलेक्टर बिरादरी से एक-एक करके अधिकार छीने जा रहे हैं। कलेक्टर अब पेड़ काटने की परमिशन भी नहीं दे सकता। हाई कोर्ट के आदेश पर सरकार ने यह अधिकार कलेक्टर से छीन लिया है। 

Madhya Pradesh Govt Curtails Collectors’ Powers Again, Sparks Debate Over Bureaucratic Autonomy

मध्य प्रदेश शासन की ओर से जारी हुए आदेश में बताया गया है कि, मप्र के सभी 413 नगरीय निकायों में अब निजी या सरकारी जमीन पर पेड़ों के कटाई की परमिशन जिला प्रशासन या नगर निगम के अधिकारी नहीं दे सकेंगे। मध्य प्रदेश में अब कहीं भी पेड़ काटने या पेड़ों की छंटाई की परमिशन वन विभाग के वन परिक्षेत्र अधिकारी (फॉरेस्ट रेंजर) से लेनी होगी। यदि वह परमिशन नहीं देता है तो उसकी अपील उप वनमंडल अधिकारी (एसडीओ फॉरेस्ट) के पास करनी होगी।

शासन स्तर पर कार्रवाई पूरी

राज्य सरकार ने मप्र वृक्षों का परिरक्षण (नगरीय क्षेत्र) अधिनियम, 2001 की धारा-4 और धारा-9 की शक्तियों का उपयोग करते फॉरेस्ट रेंजर को ट्री-ऑफिसर और उप वन मंडल अधिकारी (एसडीओ) को अपीलीय अधिकारी के रूप में अधिसूचित कर दिया है। इस संबंध में नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है।

हाईकोर्ट ने दो माह पहले दिया था आदेश 

मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने फरवरी माह में एक जनहित याचिका पर राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि जिला कलेक्टरों को ट्री-ऑफिसर की नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं हैं। यह अधिकार सिर्फ राज्य सरकार को है। इसी याचिका में हाई कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा मनमाने ढंग से इंदौर शहर के एमओजी लाइंस प्रोजेक्ट में हरे-भरे पेड़ों को काटने की अनुमति को रद्द किया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह वन सेवा के अधिकारियों को ही ट्री ऑफिसर के रूप में नियुक्त करे। 

खबर का सबक 

कलेक्टरों ने नेताओं को खुश करने के लिए पेड़ों को काटने की मनमानी अनुमति जारी की। नतीजा उनके खिलाफ जनहित याचिका दाखिल हो गई। अब यह अधिकार फॉरेस्ट रेंजर को दे दिया गया है। हम जानते हैं कि फॉरेस्ट रेंजर भी पेड़ों की रक्षा नहीं करेंगे। नेताओं का प्रेशर और कारोबारी की रिश्वत फॉरेस्ट रेंजर जैसे अधिकारी को किसी भी समय अपने निर्धारित कर्तव्य को भूल जाने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन इस खबर की सबसे बड़ी बात यह है कि कलेक्टर के हाथ से पावर चली गई है। यदि कलेक्टर्स बैलेंस बनाकर रखते तो आज यह स्थिति नहीं होती।
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