सिर्फ भारतीय मनुस्मृति ही नहीं कई सभ्यताओं के ग्रंथों से छेड़छाड़ की गई है : Manoj Srivastava, Retired IAS

Updesh Awasthee
भोपाल, 14 मार्च 2026
: पिछले कुछ समय में खुलासा हुआ है कि, भारत में मनुस्मृति सहित कई ग्रंथों के साथ छेड़छाड़ हुई है। इसके कारण समाज में मतभेद पैदा हुए। भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हुए बताया है कि केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं के प्राचीन ग्रंथो के साथ इसी प्रकार की छेड़छाड़ हुई है। यह एक सोची समझी पॉलिटिकल रणनीति थी। 

Not Only Manusmriti, Texts of Many Civilisations Were Altered

लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव का मुख्य तर्क है कि मनुस्मृति और अन्य भारतीय ग्रंथों में प्रक्षेपों (मिलावट) के माध्यम से हेरफेर करने की प्रक्रिया केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह उपनिवेशवाद की एक वैश्विक रणनीति थी। श्री मनोज श्रीवास्तव के अनुसार, उपनिवेशकों ने यह समझा कि किसी समाज को पूरी तरह अधीन करने के लिए उनकी पहचान के सबसे गहरे स्रोतों (उनके पवित्र ग्रंथों, उत्पत्ति की कथाओं और आध्यात्मिक शब्दावली) पर नियंत्रण पाना आवश्यक है।

श्री मनोज श्रीवास्तव ने औपनिवेशिक लेखनी की इस रणनीति के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है:
हेरफेर की रणनीतियाँ: जहाँ ग्रंथों का पूर्ण विनाश संभव नहीं था, वहाँ उपनिवेशकों ने सूक्ष्म रणनीतियाँ अपनाईं। इनमें वैचारिक उद्देश्यों के लिए ग्रंथों का प्रतिलेखन (transcription), धर्मशास्त्रीय आक्रमण के रूप में अनुवाद, और स्वदेशी कथाओं में ईसाई ढाँचों का समावेश शामिल था। इसका परिणाम यह हुआ कि ऐसे ग्रंथ सामने आए जो स्वदेशी आवाज़ों को सुरक्षित रखने का भ्रम तो देते थे, लेकिन वास्तव में उपनिवेशक के पूर्वाग्रहों को स्थापित करते थे।

पोपोल वुह का उदाहरण: 

श्री मनोज श्रीवास्तव ने मेसोअमेरिकी ग्रंथ 'पोपोल वुह' को 'औपनिवेशिक दस्तावेज़' बताया है। हालांकि यह माया सभ्यता की प्राचीन कथा है, लेकिन इसकी एकमात्र जीवित प्रति मिशनरी फ्रांसिस्को ज़िमेनेज़ द्वारा तैयार की गई थी, जिसका उद्देश्य स्वदेशी लोगों का ईसाई धर्म में परिवर्तन करना था। इस ग्रंथ की प्रस्तावना में ही स्पष्ट है कि इसे "ईश्वर के नियम और ईसाई धर्म के अधीन" लिखा गया था।

अफ्रीकी मौखिक परंपराओं का दमन: 

अफ्रीका में उपनिवेशकों ने स्वदेशी लिपियों को नज़रअंदाज़ किया और मौखिक परंपराओं को "पिछड़ा" या "असभ्य" करार दिया। जब मिशनरियों ने इन परंपराओं को दर्ज किया, तो उन्होंने इसे सांस्कृतिक तुच्छता के नज़रिए से देखा, जिससे मूल धार्मिक ज्ञान की वैधता समाप्त हो गई। दक्षिण अफ्रीकी भाषाओं में बाइबल के अनुवादों ने समुदायों की धार्मिक कल्पना को औपनिवेशिक साँचों में फिर से ढाल दिया।

मॉर्मन बुक और पहचान का निर्माण: उत्तरी अमेरिका में एक नया "ग्रंथ" (मॉर्मन बुक) रचा गया, जिसने स्वदेशी लोगों को "शापित" और "अपमानित" वंशज के रूप में चित्रित किया। इस धार्मिक कथा का उपयोग अमेरिकी भारतीयों के विस्थापन और आत्मसात्करण को दिव्य इच्छा बताकर उचित ठहराने के लिए किया गया।

धर्मशास्त्रीय आत्मसात्करण: लेखक बताते हैं कि मिशनरियों ने अक्सर स्वदेशी प्रतीकों का बाहरी रूप बनाए रखा लेकिन उन्हें उनके मूल अर्थ से खाली कर ईसाई सामग्री से भर दिया। उदाहरण के लिए, पेरू में 'वीराकोचा' (सृष्टिकर्ता देवता) की अवधारणा को ईसाई ईश्वर की "पूर्वानुभूति" के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया गया ताकि स्वदेशी अर्थ को मिटाया जा सके।

भाषाई उपनिवेशीकरण: लेखक का कहना है कि स्वदेशी भाषाओं के शब्दों का मनमाना अर्थान्वयन भी उपनिवेशीकरण का एक कार्य था। इससे पवित्र भाषाई परंपराएँ भीतर से उपनिवेशित हो गईं, ध्वनि और व्याकरण तो मूल रहा, लेकिन सामग्री विदेशी हो गई।

निष्कर्ष के रूप में, लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया शक्ति की अत्यधिक असमानता का परिणाम थी। आज पूर्व के गुलाम देशों के लिए अपने पवित्र ग्रंथों का 'उपनिवेश-मुक्तिकरण' (decolonization) एक अनिवार्य शैक्षणिक और सांस्कृतिक परियोजना है, ताकि वे खोई हुई स्मृतियों और उन आवाज़ों को पुनः प्राप्त कर सकें जिन्हें दबा दिया गया था।
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