भोपाल, 2 फरवरी 2026 : मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र (17 से 27 फरवरी) में ग्वालियर के विधायक श्री साहब सिंह गुर्जर ने एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि ग्वालियर में स्कूल शिक्षा व्यवस्था फेल हो गई है। हालांकि नेता प्रतिपक्ष ने उनके साथ नहीं दिया, इसलिए कमजोर स्थिति में होने के बावजूद स्कूल शिक्षा मंत्री ने विधायक साहब सिंह गुर्जर द्वारा प्रस्तुत किए गए तमाम सरकारी आंकड़ों को मौखिक रूप से खारिज कर दिया। मुद्दा तो उठा लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ:-
Gwalior School Education Exposed in Assembly
ग्वालियर ग्रामीण के विधायक साहब सिंह गुर्जर ने सदन में पुरजोर तरीके से यह मुद्दा उठाया कि सरकार का 'स्कूल चलें हम' अभियान ग्वालियर जिले में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। उन्होंने बताया कि अकेले ग्वालियर जिले में 34,000 बच्चे ड्रॉपआउट (बीच में शिक्षा छोड़ चुके) हैं और 6,000 बच्चे 'शाला त्यागी' (स्कूल छोड़ने वाले) की श्रेणी में हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतनी बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से बाहर हैं, तो सरकार के अभियानों की सफलता के दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने मुद्दे को लिफ्ट नहीं किया
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि यदि विपक्ष का कोई विधायक, किसी गंभीर मुद्दे को उठा तो, नेता प्रतिपक्ष उसे मुद्दे को लिफ्ट करवा दे। लॉजिक और नंबर्स के साथ अपने विधायक का सपोर्ट करें और सरकार पर प्रेशर क्रिएट करें परंतु नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए। उन्होंने और विधायक लखन घनघोरिया ने आरोप लगाया कि:-
1. सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं (पेयजल, शौचालय, बिजली) का अभाव और शिक्षकों की भारी कमी ही ड्रॉपआउट बढ़ने का मुख्य कारण है।
2. विपक्ष ने यह भी दावा किया कि पिछले 14 वर्षों में प्रदेश के सरकारी स्कूलों से लाखों बच्चे बाहर हो गए हैं।
इन दोनों पॉइंट्स में कोई दम नहीं है। ग्वालियर जिले की सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं है। नेता प्रतिपक्ष ने 10 साल पुराने निबंध की एक लाइन को कॉपी पेस्ट कर दिया। दूसरे बिंदु का तो कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि उसमें हवा हवाई आरोप लगाया गया जिसका कोई प्रतिफल नहीं हो सकता।
स्कूल शिक्षा मंत्री ने आंकड़ों को मानने से इनकार कर दिया
जब नेता प्रतिपक्ष और ग्वालियर जिले के अन्य विधायकों ने इस मुद्दे पर विधायक साहब सिंह गुर्जर का सपोर्ट नहीं किया तो इस बात से उत्साहित होकर स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में ड्रॉपआउट रेट में उल्लेखनीय गिरावट आई है।
मध्य प्रदेश का औसत ड्रॉपआउट रेट: एक विश्लेषण
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में विभिन्न स्तरों पर ड्रॉपआउट रेट में सुधार का दावा किया गया है:
प्राथमिक स्तर (कक्षा 1): सरकार का दावा है कि कक्षा 1 में ड्रॉपआउट रेट अब शून्य (0%) पर आ गया है, जो पहले 6.8 प्रतिशत था।
उच्च प्राथमिक स्तर: इस स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 10.6 प्रतिशत से घटकर अब 6.3 प्रतिशत रह गया है।
माध्यमिक (Secondary) स्तर: इस स्तर पर अभी भी दर अधिक है, लेकिन यह 21.4 प्रतिशत से घटकर अब 16.8 प्रतिशत पर आ गई है।
ग्वालियर और मध्य प्रदेश के औसत का तुलनात्मक अध्ययन
ग्वालियर की स्थिति और प्रदेश के औसत के बीच एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है:
जहां सरकार पूरे प्रदेश में कक्षा 1 के लिए शून्य ड्रॉपआउट का दावा कर रही है, वहीं ग्वालियर जिले में 34,000 बच्चों का ड्रॉपआउट होना यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर स्थिति राज्य के औसत दावों के विपरीत बहुत चिंताजनक है।
राज्य स्तर पर 'स्कूल चलें हम' अभियान के माध्यम से नामांकन में 32.4 प्रतिशत की वृद्धि का दावा किया गया है। इसके विपरीत, ग्वालियर के लिए विधायक का दावा है कि यह अभियान वहां पूरी तरह फेल हो गया है।
प्रदेश स्तर पर सेकेंडरी स्तर का ड्रॉपआउट 16.8 प्रतिशत है। ग्वालियर में 6,000 शाला त्यागी बच्चों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि जिले में विशेष रूप से माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर बच्चों को स्कूल में रोके रखना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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