भारत में फर्जी दलित असली दलितों का हिस्सा खा रहे हैं - My Opinion by Manoj Shrivastava

Updesh Awasthee
जो लोग होलिका प्रह्लाद प्रसंग को भक्ति की नास्तिकता पर जीत के रूप में पढ़ते हैं वे भी इस प्रसंग का अर्थ संकोच ही करते हैं, हालाँकि वे जेनेऊ के उन ढोरों से फिर भी बेहतर हैं जिन्हें यह प्रसंग एक दलित स्त्री पर अत्याचार की तरह लगता है। भारत में फर्जी दलित असली दलितों का हिस्सा खा रहे हैं, फर्जी अत्याचार कथाएँ असली अत्याचारों को छुपाने के लिए गढ़ी गई हैं, यह जेनेऊ-निगमित अर्थान्वयन से पता चलता है। 

Fake Dalits Eating Into Genuine Quotas’: Manoj Shrivastava Ex IAS

और ये कथाएँ इसलिए उलटपंथियों को रास आती हैं क्योंकि इनका तथाकथित दलित उसी तरह से इन कथाओं में सत्ता के अधिकतम संघनन का प्रतिनिधित्व करता है जैसे स्वयं वामपंथी राज्य।जैसे मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत में साम्यवादी राज्य में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियाँ एक ही सर्वोच्च संस्था (जैसे सुप्रीम सोवियत) में केंद्रित होती हैं। शक्तियों का पृथक्करण नहीं होता, जिससे अधिकतम शक्ति का संकेंद्रण सुनिश्चित होता है। केवल एक पार्टी को राजनीतिक शक्ति का एकाधिकार प्राप्त होता है। अन्य पार्टियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है, जिससे सारी निर्णय-प्रक्रिया पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में केंद्रित हो जाती है। निजी उद्यम या बाजार की स्वतंत्रता नहीं रहती, जिससे आर्थिक शक्ति भी पार्टी-राज्य में केंद्रित हो जाती है। विरोधी दलों, स्वतंत्र यूनियनों और हड़तालों पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है और KGB/स्टासी जैसी गुप्त पुलिस और आतंक के माध्यम से असहमति को कुचल दिया जाता है, जिससे दमनात्मक शक्ति (coercive power) का अधिकतम संकेंद्रण होता है।

सभी मीडिया, प्रचार और सूचना प्रवाह राज्य/पार्टी के नियंत्रण में होते हैं। सेंसरशिप और प्रोपेगैंडा से वैकल्पिक विचारों को दबाया जाता है, जिससे वैचारिक शक्ति भी पूरी तरह केंद्रित रहती है।शीर्ष (पोलित ब्यूरो या एक नेता) के फैसले सभी पर बाध्यकारी होते हैं। आंतरिक लोकतंत्र नाममात्र का होता है, जिससे शक्ति छोटे से अभिजात वर्ग में केंद्रित रहती है। केंद्रीकृत शक्ति की आवश्यकता के कारण साम्यवादी व्यवस्था स्वाभाविक रूप से तानाशाही/सर्वसत्तावादी बन जाती है। इतिहास में स्टालिन, माओ आदि के शासन इसका प्रमाण हैं, जहाँ शक्ति एक व्यक्ति या छोटे समूह में केंद्रित रही। जीवित साम्यवादी राज्यों (चीन, वियतनाम, उत्तर कोरिया) में शक्ति पार्टी नेता (जैसे शी जिनपिंग) में और अधिक केंद्रित हो रही है। मजदूर वर्ग नाममात्र का मालिक होता है, लेकिन वास्तव में नियंत्रण पार्टी अभिजात वर्ग के पास रहता है।

यह मॉडल आप ध्यान से देखें तो चाहे हिरण्यकशिपु हो, चाहे रावण, चाहे महिषासुर सबके शासन में नज़र आता है। हिरण्यकशिपु ने क्या किया था ? वह तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। विष्णु पुराण में कहा गया है कि : 
त्रैलोक्यं वशमानिन्ये ब्रह्मणो वरदर्पितः ॥
इन्द्रत्वमकरोदैत्यः स चासीत्सविता स्वयम् ।
वायुरग्निरपां नाथः सोमश्चाभून्महासुरः ॥ 
धनानामधिपः सोऽभूत्स एवासीत्स्वयं यमः ।
यज्ञभागानशेषांस्तु स स्वयं बुभुजेऽसुरः ॥
 देवाः स्वर्गं परित्यज्य तत्त्रासान्मुनिसत्तम ।
विचेरुरवनौ सर्वे बिभ्राणा मानुषीं तनुम् ॥ 
जित्वा त्रिभुवनं सर्वं त्रैलोक्यैश्वर्यदर्पितः ।
उपगीयमानो गन्धर्वैर्बुभुजे विषयान्प्रियान् ॥ 
पानासक्तं महाकायं हिरण्यकशिपुं तदा।
उपासान् चक्रिरे सर्वे सिद्धगन्धर्वपन्नगाः ॥ 
अवादयन् जगुश्चान्ये जयशब्दं तथापरे।
दैत्यराजस्य पुरतश्चक्रुः सिद्धा मुदान्विता:॥
त्रैलोक्यं वशमानिन्ये - में सर्वाधिकारवाद की वही भूख है। दर्पित: में वही अहंकार है। ‘धनानामधिप:’ में वही धनलिप्सा है। बुभुजेऽसुर: में वही तानाशाही भूख है। सूर्य, वायु, अग्नि, वरुण और चंद्रमा की अधीनता में प्रकृति को रौंदने वाला वही उपभोक्तावाद और भौतिकवाद है।विषयान्प्रियान और मद्यपान आसक्ति में वही विलासिता है जो एकाधिकारवाद में होती है। उस दैत्यराजके सामने सिद्धगण के बाजे बजाकर उसका यशोगान करने और जयजयकार करने में वही मीडिया कंट्रोल है।

और ईश्वर इन लोगों को वास्तविक रूप से खतरा नज़र आता है। क्योंकि धर्म सोच की आजादी देता है, वह ब्रेनवाशिंग नहीं करता। विष्णु पुराण में जब प्रह्लाद से उसके शिक्षित होने पर हिरण्यकशिपु उसकी शिक्षा का सार पूछता है कि ‘वत्स ! अबतक अध्ययन में निरन्तर तत्पर रहकर तुमने जो कुछ पढ़ा है उसका सारभूत शुभ भाषण हमें सुनाओ’ तो प्रह्लाद कहते हैं : 
श्रूयतां तात वक्ष्यामि सारभूतं तवाज्ञया । समाहितमना भूत्वा यन्मे चेतस्यवस्थितम् ॥
अनादिमध्यान्तमजमवृद्धिक्षयमच्युतम् । प्रणतोऽस्म्यन्तसन्तानं सर्वकारणकारणम् ॥
कि पिताजी ! मेरे मनमें जो सबके सारांशरूपसे स्थित है वह मैं आपकी आज्ञानुसार सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनिये।जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय-शून्य और अच्युत हैं, समस्त कारणोंके कारण तथा जगत् की स्थिति और अन्तकर्ता उन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। 
तब हिरण्यकशिपुने क्रोधसे नेत्र लाल कर प्रह्लादके गुरुकी ओर देखकर काँपते हुए ओठोंसे कहा- 
ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षस्तुतिसंहितम् । असारं ग्राहितो बालो मामवज्ञाय दुर्मते ॥
रे दुर्बुद्धि ब्राह्मणाधम ! यह क्या ? तूने मेरी अवज्ञा कर इस बालकको मेरे विपक्षीकी स्तुतिसे युक्त असार शिक्षा दी है! 
गुरुजी बेचारे नर्वस हो जाते हैं। उनके employer का विश्वास उसी शिक्षा में है जो संस्थानीकृत हो। वही जो स्वार्जित न हो। ईवान ईलिच ने यही सोच कर शायद deschooling society की बात की थी।
पर हड़बड़ाये गुरुजी कहते हैं : दैत्यराज ! आपको क्रोधके वशीभूत न होना चाहिये। आपका यह पुत्र मेरी सिखायी हुई बात नहीं कह रहा है। 
हिरण्यकशिपु बोला- बेटा प्रह्लाद ! बताओ तो तुमको यह शिक्षा किसने दी है? तुम्हारे गुरुजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया नहीं है।

इस पर प्रह्लाद जो कहते हैं वह कबीर, लियोनार्डो डा विंची, माइकल फैराडे, अब्राहम लिंकन, एडीसन, टेस्ला, बेंजामिन फ्रेंकलिन, श्रीनिवास रामानुजम, चार्ल्स डिकेंस, मार्क ट्वेन, विंसेंट वॉनगॉफ आदि प्रतिभाओं को समझने में हमारी मदद करता है। वह बताता है कि शिक्षा किसी तरह से बाहर से इंजेक्ट की गई आरोपणा नहीं है। वह अंतर में प्रज्वलित होने वाली अग्नि है। 
प्रह्लादजी बोलते हैं - पिताजी ! हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत्के उपदेशक हैं। उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसीको कुछ सिखा सकता है?
हिरण्यकशिपु बोला - अरे मूर्ख ! जिस विष्णुका मुझ जगदीश्वरके सामने धृष्टतापूर्वक निश्शंक होकर परम्बार वर्णन करता है, वह कौन है ?
प्रह्लादजी बोले- योगियोंके ध्यान करनेयोग्य इसका परमपद वाणीका विषय नहीं हो सकता तथा जिससे विश्व प्रकट हुआ है और जो स्वयं विश्वरूप वह परमेश्वर ही विष्णु है॥ २२ ॥
हिरण्यकशिपु बोला- अरे मूढ। मेरे रहते हुए कौन परमेश्वर कहा जा सकता है?

कभी ध्यान दें कि सर्वाधिकारवादी सत्ताओं  के भीतर भी ईश-निषेध की ऐसी ही झक सवार है।उन्हें वह शिक्षा हिरण्यकशिपु की तरह असार लगती है जिसमें सत्ता की ईशविरोधी प्राथमिकताएँ प्रतिबिंबित नहीं होतीं। मसलन रूस के सेकंडरी स्कूल में 1964 से Osnovy Naucnogo Ateizma या  Fundamentals of Scientific Atheism के नाम से एक पाठ्यपुस्तक चलती थी जो कहती है कि Religion is a fantasy, a distortion of reality; there is no God, only materialist science explains the world. वहाँ कक्षाओं में Bezbozhnik नामक पुस्तक में लिखा जाता है : There is no God! Science proves religion is superstition and backwardness. चीन की पाठ्यपुस्तक Common Knowledge of Philosophy में कहा गया कि God did not create living creatures, but living creatures created God. उत्तर कोरिया में Juche guidelines पाठ्यक्रम के लिए बनाई गई हैं : The Juche idea is based on the philosophical principle that man is the master of everything and decides everything. It is the man-centred world outlook. क्रांतिकारी इतिहास वाले पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि Having faith in God is an act of espionage. Only Kim Il Sung is a god in North Korea.

वामपंथ प्रह्लाद का प्रतिलोम तो है वह हिरण्यकशिपु की तरह सर्वशक्तिमान सत्ता का निर्माता भी है। 
लगभग ऐसा ही सर्वाधिकारवादी ट्रोप रावण और महिषासुर के प्रसंगों में भी आता है। शक्ति का एकछत्र संकेंद्रण करने वाले जिन्हें दलित  नज़र आते हैं, वे प्राध्यापक या छात्र छात्राएँ ढोर ही हो सकते हैं। उन्हें ऐसी ही सत्ताएँ अपने आदर्श के रूप में नज़र आती हैं। 

दरअसल जैसे सर्वाधिकारवादी सत्ताएँ दलित की सत्ता होने का भरम dictatorship of the proletariat के नाम पर रचती हैं, वैसे ही इन ढोरों को भी यह जरूरी हो जाता है कि वे ऐसे अत्याचारी राजसत्ताधारियों को दलित बताएँ। 
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड ऑफिसर हैं।
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