नेशनल न्यूज डेस्क, 4 मार्च 2026: हिमाचल प्रदेश की हाई कोर्ट ने एक बड़े विवाद का निपटारा कर दिया है। यदि शासन अथवा डिपार्टमेंट ने किसी कर्मचारी को किसी भी कारण से सेवा के योग्य नहीं समझा है और वह व्यक्ति किसी भी न्यायालय के आदेश के अंतर्गत सेवा में बना हुआ है, तो उसको अन्य नियमित कर्मचारियों के समान इंक्रीमेंट का अधिकार है या नहीं।
Are Employees Appointed by Court Order Entitled to Increment? Read the High Court Verdict
यह मामला पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ईसीएचएस) के तहत कार्यरत अनुबंध कर्मचारियों से जुड़ा है। विभाग ने नई नियुक्तियां करने के लिए विज्ञापन जारी किए थे, जिसे इन कर्मचारियों ने अदालत में चुनौती दी थी। वर्तमान में ये कर्मचारी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के आधार पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। विवाद तब शुरू हुआ, जब विभाग ने 24 जुलाई 2025 को अनुबंध कर्मचारियों के वेतन में संशोधन किया, लेकिन 28 नवंबर 2025 को एक आदेश जारी कर यह कह दिया कि जो कर्मचारी अदालती आदेशों के सहारे काम कर रहे हैं, उन्हें बढ़ा हुआ वेतन नहीं मिलेगा।
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नियमित अनुबंध कर्मचारी और अदालती आदेश पर कार्यरत कर्मचारी दो अलग-अलग श्रेणियां हैं। कोर्ट ने कहा कि दोनों श्रेणियों के कर्मचारी एक ही तरह की ड्यूटी कर रहे हैं। जब काम समान है, तो वेतन में भेदभाव नहीं किया जा सकता। विभाग का यह वर्गीकरण तर्कहीन है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अनुबंध कर्मचारियों को केवल इसलिए संशोधित वेतन (रिवाइज पे) के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि कोई कर्मचारी अदालती आदेश के बल पर सेवा में बना हुआ है। अदालत ने ईसीएचएस के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें ऐसे कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने पर रोक लगाई थी। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि 28 नवंबर 2025 के उस आदेश को रद्द किया जाए, जो वेतन वृद्धि रोकता है। याचिकाकर्ताओं को अन्य अनुबंध कर्मचारियों की तरह संशोधित वेतन और बकाया देय तिथि से प्रदान किया जाए। इसके साथ ही विभाग इन कर्मचारियों से किसी भी प्रकार की रिकवरी न करे।

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