दिव्यांग CGLE कैंडिडेट ने CAG को सबक सिखाया, सुप्रीम कोर्ट में हराया

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 13 मार्च 2026
: CAG यानी भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक का नाम आते ही गलती करने वालों का पसीना छूट जाता है और लोग उम्मीद करते हैं कि CAG वालों से तो गलती हो ही नहीं सकती लेकिन CAG वालों ने एक दिव्यांग के साथ अन्याय किया, लेकिन संकल्प की शक्ति देखिए। दिव्यांग ने अपना दुर्भाग्य मानकर स्वीकार नहीं किया बल्कि संघर्ष किया और सुप्रीम कोर्ट में CAG को हराया। 

Disabled CGLE Candidate Wins Battle Against GAG of India in Supreme Court of India

सुधांशु कर्दम बनाम भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Sudhanshu Kardam vs. CAG) मामला दिव्यांग व्यक्तियों (PwD) के अधिकारों और सरकारी नियुक्तियों में उनकी उपयुक्तता से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद है। यह मामला वर्ष 2018 में शुरू हुआ जब कर्मचारी चयन आयोग (SSC) ने भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में ग्रुप ‘B’ और ग्रुप ‘C’ के पदों को भरने के लिए कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल एग्जामिनेशन-2018 (CGLE-2018) की प्रक्रिया शुरू की।

अमित यादव ने 'अन्य दिव्यांग' (Other PwD) श्रेणी के तहत 'ऑडिटर' पद (पोस्ट कोड D33) के लिए आवेदन किया था। वे 'मानसिक बीमारी' (Mental Illness) से पीड़ित थे और उनके पास 55% विकलांगता का वैध प्रमाण पत्र था। उन्होंने परीक्षा के सभी चरणों (Tier-I से Tier-IV) को सफलतापूर्वक पास कर लिया और उन्हें नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया गया।

सुधांशु कर्दम अनुसूचित जाति श्रेणी से थे और 'विशिष्ट शिक्षण अक्षमता' (Specific Learning Disability - SLD) से पीड़ित थे (40% से अधिक अक्षमता)। वे भी अमित यादव के समान ही मेरिट वाले उम्मीदवार थे।

विवाद की शुरुआत: 28 सितंबर 2021 को, CAG ने एक सूची जारी की जिसमें कहा गया कि अमित यादव जैसे उम्मीदवारों के डोजियर (दस्तावेज) SSC को वापस भेजे जा रहे हैं। इसका आधार यह था कि 'ऑडिटर' का पद उन श्रेणियों के लिए 'उपयुक्त' (not suitable) नहीं माना गया था, जिनके तहत इन्होंने आवेदन किया था।

CAT में CAG हार गया

अमित यादव ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), दिल्ली में अपील की। उन्होंने 4 जनवरी 2021 की एक सरकारी अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें 'मानसिक बीमारी' को ऑडिटर पद के लिए उपयुक्त माना गया था। CAT ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और CAG को एक मेडिकल बोर्ड गठित करने तथा फिट पाए जाने पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया।

CAG ने हाई कोर्ट में चैलेंज कर दिया

CAG ने CAT के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने CAT के आदेश को रद्द कर दिया और CAG के पक्ष में फैसला सुनाया। इस बीच, सुधांशु कर्दम ने भी इस कार्यवाही में हस्तक्षेप किया क्योंकि उनका मामला भी इसी तरह का था।

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ उम्मीदवारों की ओर से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। उम्मीदवारों (सुधांशु और अमित) का तर्क था कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 4 जनवरी 2021 की अधिसूचना स्पष्ट रूप से उनकी विकलांगता श्रेणियों को 'ऑडिटर' जैसे पदों के लिए उपयुक्त मानती है।

CAG का तर्क था कि 2018 की भर्ती के समय विशेषज्ञ समिति ने ऑडिटर या सहायक लेखा अधिकारी जैसे पदों को 'विशिष्ट शिक्षण अक्षमता' या 'मानसिक बीमारी' वाले उम्मीदवारों के लिए उपयुक्त नहीं माना था। इसलिए, SSC द्वारा की गई सिफारिश नियमों के खिलाफ थी।

न्यायालय की टिप्पणी और फैसला

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान, अदालत ने 2021 की अधिसूचना पर ध्यान दिया। अदालत के हस्तक्षेप के बाद, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अर्चना पाठक दवे ने निर्देश प्राप्त किए और एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया। CAG ने अदालत में स्वीकार किया कि वे नियम की स्थिति में बदलाव (2021 की अधिसूचना) के बाद उम्मीदवारों को उपयुक्त ग्रुप 'सी' पदों पर समायोजित करने के लिए तैयार हैं।

न्यायालय का अंतिम फैसला (12 मार्च 2026):

न्यायालय ने SSC को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर सुधांशु कर्दम और अमित यादव के डोजियर CAG को भेजे। CAG को निर्देश दिया गया कि डोजियर प्राप्त होने पर इन दोनों उम्मीदवारों को ग्रुप 'सी' पदों पर नियुक्ति प्रदान की जाए। यदि विज्ञापन के अनुसार पद पहले ही भर चुके हैं, तो सरकार को इन दोनों उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त पद (supernumerary posts) सृजित करने होंगे। उनकी नियुक्ति उनके कार्यभार ग्रहण करने (joining) की तिथि से प्रभावी होगी।

इस प्रकार, दिव्यांग उम्मीदवारों ने CAG जैसी संस्था को सुप्रीम कोर्ट में हरा दिया। एक बार फिर प्रमाणित हुआ कि भारत में कानून सबके लिए समान है और न्याय सबके लिए उपलब्ध है। दोनों कैंडिडेट्स ने सही मोर्चे पर लड़ाई लड़ी और जीत गए। जबकि भारत में ज्यादातर लोग CAT तक भी नहीं जाते। नियोक्ता संस्थान द्वारा रिजेक्ट कर देने के बाद सोशल मीडिया पर न्याय प्रक्रिया का मूल्यांकन करते रहते हैं।
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