नवोदय विद्यालय सहित स्वायत्त संस्थानों के कर्मचारी, सरकारी कर्मचारी नहीं होते: हाई कोर्ट

Updesh Awasthee
जयपुर ब्यूरो, 4 मार्च 2026
: राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने कर्मचारियों से संबंधित एक राष्ट्रीय स्तर के विवाद का निपटारा किया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नवोदय विद्यालय अथवा इसके जैसे स्वायत्त संस्थानों (Autonomous Bodies) के कर्मचारियों को, केंद्रीय कर्मचारी नहीं माना जा सकता। इनको केंद्रीय कर्मचारियों के समान अधिकार नहीं दिए जा सकते। 

Employees of Navodaya Vidyalayas and Autonomous Bodies Are Not Government Servants: High Court

यह मामला अर्जुन लाल बुनकर (पुत्र श्री हीरा लाल बुनकर) से जुड़ा है, जो पहले नवोदय विद्यालय समिति के तहत शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। बाद में, राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा पास कर वे राज्य सरकार में प्रधानाध्यापक (राजकीय माध्यमिक विद्यालय, झार, जयपुर) के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने अपनी नवोदय विद्यालय की पूर्व सेवा को आधार बनाकर वेतन संरक्षण और पेंशन लाभ की मांग की थी। राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण ने 7 अप्रैल 2010 को उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को लाभ देने का निर्देश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। 

राज्य सरकार के वकीलों के तर्क 

राज्य सरकार की ओर से उपराजकीय अधिवक्ता श्री देवांश शर्मा ने कड़े तर्क पेश किए:
उन्होंने दलील दी कि नवोदय विद्यालय समिति सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक पंजीकृत संस्था है और यह सीधे सरकार का विभाग नहीं है।
सरकार का तर्क था कि राजस्थान सेवा नियम (RSR) के नियम 26 के तहत वेतन संरक्षण का लाभ केवल उन्हीं को मिलता है जो पहले से राज्य या केंद्र सरकार की नियमित सेवा में हों।
वकील ने कहा कि केवल सरकारी अनुदान मिलने या शासी निकाय में सरकारी प्रतिनिधि होने से कोई संस्था सरकारी विभाग नहीं बन जाती और न ही उसके कर्मचारी "सरकारी सेवक" कहलाते हैं।
उन्होंने 1 सितंबर 2025 के उस सरकारी परिपत्र का भी हवाला दिया जिसमें स्पष्ट किया गया है कि स्वायत्त निकायों और पीएसयू के कर्मचारियों को राज्य सेवा में चयन के बाद वेतन संरक्षण नहीं मिलेगा।

प्रतिवादी अर्जुन लाल बुनकर के वकीलों के तर्क 

प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता श्री अखिल सिमलोटे और श्री दीक्षांत जैन ने अधिकरण के आदेश का बचाव किया:
उन्होंने तर्क दिया कि नवोदय विद्यालय समिति पूर्णतः केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित है और उस पर प्रशासनिक नियंत्रण भी सरकार का ही है, इसलिए इसे "भारत सरकार की संस्था" माना जाना चाहिए।
उनका कहना था कि नियम 26 के प्रावधानों के अनुसार, भारत सरकार की संस्था से राज्य सेवा में आने पर वेतन संरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
प्रतिवादी पक्ष ने अन्य मामलों, जैसे केंद्रीय विद्यालय के कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों और पूर्व में दिए गए कुछ अदालती फैसलों का भी उदाहरण दिया।

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी और फैसला 

दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस प्रवीर भटनागर ने स्पष्ट किया कि "राजस्थान सरकारी सेवक" वे हैं जिनकी सेवा शर्तें संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत विनियमित होती हैं और जिनका वेतन राज्य की समेकित निधि (Consolidated Fund) से दिया जाता है। स्वायत्त संस्था के कर्मचारी इस श्रेणी में नहीं आते।

स्वायत्त निकाय बनाम सरकारी विभाग: 

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि स्वायत्त निकाय स्वतंत्र होते हैं और उनके कर्मचारी सरकारी कर्मचारियों के समान समानता का दावा नहीं कर सकते।
हाई कोर्ट ने पाया कि अपीलीय अधिकरण ने पिछली सेवा की प्रकृति की जांच किए बिना और नियमों की गलत व्याख्या करते हुए लाभ प्रदान किया था, जो कानूनन गलत है। 

अंतिम निर्णय 

न्यायालय ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के 2010 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट फैसला दिया कि अर्जुन लाल बुनकर को पिछली सेवा के आधार पर वेतन संरक्षण या पेंशन लाभ का कोई विधिक अधिकार नहीं है। यह फैसला उन सभी कर्मचारियों के लिए एक नजीर बनेगा जो स्वायत्त निकायों से राज्य सरकार की सेवाओं में शामिल होते हैं।
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