बिना Phd के लेक्चर से प्रोफेसर और प्रोफेसरों की पदोन्नति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Updesh Awasthee

Supreme Court of India Delivers Major Ruling on Professor Without PhD 

नई दिल्ली, 27 फरवरी 2026: क्या पीएचडी के बिना किसी लेक्चर का प्रमोशन करके उसको प्रोफेसर बनाया जा सकता है और पीएचडी के बिना ही किसी प्रोफेसर का प्रमोशन करके उसको डायरेक्टर बनाया जा सकता है? इस सवाल का जवाब भले ही आपके पास हो लेकिन, यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक गया है और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा फैसला दिया है। 

कहानी की शुरुआत: पीएच.डी. (Ph.D.) की अनिवार्यता और नियम 6A

विवाद की जड़ें दो दशक पुरानी हैं। 18 सितंबर, 2004 को केरल सरकार ने 'केरल तकनीकी शिक्षा सेवा (संशोधन) नियम, 2004' में नियम 6A जोड़ा था। इस नियम के तहत, उन लेक्चरर को प्रोफेसर और निदेशक जैसे पदों के लिए पीएच.डी. डिग्री से छूट दी गई थी, जिन्हें 27 मार्च, 1990 से पहले नियुक्त किया गया था और जो 45 वर्ष की आयु पूरी कर चुके थे।

यह संशोधन अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के 15 मार्च, 2000 के उस नोटिफिकेशन के जवाब में था, जिसमें असिस्टेंट प्रोफेसर (अब एसोसिएट प्रोफेसर) के लिए पीएच.डी. अनिवार्य की गई थी। हालांकि, 18 फरवरी, 2003 को AICTE ने पदोन्नति के बाद पीएच.डी. हासिल करने के लिए सात साल की छूट भी दी थी। 

कानूनी उतार-चढ़ाव और उच्चतम न्यायालय की पहली बड़ी जीत

केरल हाई कोर्ट ने शुरू में नियम 6A को रद्द कर दिया था, लेकिन मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो 26 अप्रैल, 2016 को 'क्रिस्टी जेम्स जोस बनाम केरल राज्य' मामले में कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को पलट दिया। न्यायालय ने माना कि पीएच.डी. न होने पर अधिकतम सजा इंक्रीमेंट रोकना हो सकती है, पदोन्नति रोकना नहीं। इसी के आधार पर, डॉ. जीजी के.एस. और उनके साथियों को भी राहत मिली। इसके बाद, 7 मार्च, 2019 को केरल सरकार ने एक आदेश (GO) जारी किया, जिसके तहत अपीलीयकर्ताओं को पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospective effect) से पदोन्नत किया गया:
  • डॉ. जीजी के.एस.: 21 जून, 2012 से।
  • जॉनसन मैथ्यू: 1 अप्रैल, 2011 से।
  • बिंदुमोल ईके: 1 अप्रैल, 2014 से।

2020 में नया मोड़ आया - KAT ने आदेश रद्द कर दिया

कहानी में नया मोड़ तब आया जब केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) ने 5 मार्च, 2020 को कई सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया। इसके बाद, 3 दिसंबर, 2020 को केरल उच्च न्यायालय ने एक व्यापक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि 5 मार्च, 2010 (AICTE के नए नियमों की तारीख) के बाद प्रिंसिपल्स और प्रोफेसरों के लिए पीएच.डी. अनिवार्य है। इस आदेश से डॉ. जीजी के.एस. और अन्य प्रोफेसरों की पदोन्नति पर तलवार लटक गई, जबकि वे उस याचिका में पक्षकार (Parties) भी नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला: 27 फरवरी, 2026

आज, 27 फरवरी, 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जयदीप गुप्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि हाई कोर्ट, उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले दिए गए आदेशों की समीक्षा नहीं कर सकता।

फैसले के मुख्य बिंदु:
अपीलकर्ताओं को 28 अप्रैल, 2016 के आदेश के अनुपालन में पदोन्नत किया गया था, जिसे कोर्ट पहले ही अंतिम मान बता चुका है।
न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया कि केरल उच्च न्यायालय के 3 दिसंबर, 2020 के आदेश का अपीलकर्ताओं के करियर की संभावनाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
न्यायालय ने डॉ. बिंदु कुमार के और अन्य हस्तक्षेपकर्ताओं को यह स्वतंत्रता दी कि वे उपयुक्त मंच (ट्रिब्यूनल या रिव्यू याचिका) पर अपनी शिकायतें रख सकते हैं।
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