नई दिल्ली, 21 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट का यह जजमेंट कुछ लोगों के लिए जिंदगी में इतना राहतकारी हो सकता है कि, उनकी लाइफ का सबसे बड़ा तनाव ही खत्म हो जाए। इसलिए इस न्यूज़ को Add to collection करके रख लीजिए। बिल्डर बायर एग्रीमेंट डिस्प्यूट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लैंडमार्क जजमेंट दिया है, जो उपभोक्ताओं के हित में है और बिल्डर की मनमानी को, अमान्य कर देता है।
पारस्वनाथ डेवलपर्स लिमिटेड बनाम मोहित खिरबात और अन्य मामले की कहानी
यह मामला गुड़गांव के सेक्टर-53 में स्थित 'पारस्वनाथ एक्सोटिका' (Parsvnath Exotica) प्रोजेक्ट से संबंधित है। प्रतिवादियों (फ्लैट खरीदारों) ने इस प्रोजेक्ट में आवासीय अपार्टमेंट बुक किए थे और 2013 तक लगभग पूरी बिक्री राशि का भुगतान कर दिया था। फ्लैट बायर एग्रीमेंट (Flat Buyer Agreement) के अनुसार, निर्माण शुरू होने के 36 महीनों के भीतर (6 महीने की अतिरिक्त छूट अवधि के साथ) कब्जा दिया जाना था। हालांकि, डेवलपर निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण पूरा करने और कब्जा देने में विफल रहा। इसके बाद उपभोक्ताओं ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) का दरवाजा खटखटाया, जिसने डेवलपर्स को ब्याज के साथ कब्जा देने का आदेश दिया, लेकिन डेवलपर ने कंज्यूमर फोरम का आदेश नहीं माना और सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी।
इस मामले के मुख्य किरदार और पक्षकार:
• अपीलकर्ता (Appellants): पारस्वनाथ डेवलपर्स लिमिटेड और पारस्वनाथ हेसा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड।
• प्रतिवादी (Respondents): डॉ. मोहित खिरबात (C.A. No. 5289/2022), ग्रुप कैप्टन सुमन चोपड़ा (मृत, कानूनी उत्तराधिकारियों के माध्यम से) (C.A. No. 5290/2022), और अमन चावला व अन्य (C.A. No. 11047/2025)।
• प्रोजेक्ट: पारस्वनाथ एक्सोटिका, सेक्टर-53, गुड़गांव।
3. न्यायालय और न्यायाधीश:
• न्यायालय: भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)।
• न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और माननीय न्यायमूर्ति आर. महादेवन। (फैसला न्यायमूर्ति आर. महादेवन द्वारा लिखा गया)।
अपीलकर्ता डेवलपर की दलीलें:
NCDRC ने अनुबंध की शर्तों (Clause 10) की अनदेखी कर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। देरी के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी, श्रम की कमी और सामग्री की लागत में वृद्धि जैसे कारक जिम्मेदार थे जो उनके नियंत्रण से बाहर थे। अनुबंध के अनुसार देरी के लिए केवल ₹10 प्रति वर्ग फुट प्रति माह का मामूली मुआवजा दिया जाना चाहिए, न कि 8% ब्याज एवं ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) में देरी सरकारी नीति में बदलाव के कारण हुई। इसके लिए बिल्डर जिम्मेदार नहीं है।
प्रतिवादी उपभोक्ता की दलीलें:
लगभग 95% से अधिक भुगतान 2013 तक ही किया जा चुका था, फिर भी 10 साल से अधिक समय तक कब्जा नहीं मिला। बिना OC के कब्जा देना अवैध है, जिसे उपभोक्ताओं ने मजबूरी में स्वीकार किया। अनुबंध की शर्तें एकतरफा और दमनकारी थीं।
5. न्यायाधीश की विशेष टिप्पणियाँ:
न्यायालय ने कहा कि अनुबंध की शर्तें (जैसे देरी पर खरीदार को 24% ब्याज देना और डेवलपर को केवल ₹10 प्रति वर्ग फुट देना) स्पष्ट रूप से एकतरफा और अनुचित हैं, जो 'अनुचित व्यापार व्यवहार' (Unfair Trade Practice) की श्रेणी में आती हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) के कब्जा देने का प्रस्ताव कानूनी रूप से अमान्य है और कोई भी खरीदार इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि उपभोक्ता मंचों की शक्ति वैधानिक (Statutory) है और वे एकतरफा अनुबंधों की शर्तों से बंधे नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय:
• उच्चतम न्यायालय ने डेवलपर की अपीलों को खारिज कर दिया और NCDRC के आदेश को बरकरार रखा।
• डेवलपर को आदेश दिया गया कि वह 6 महीने के भीतर OC प्राप्त करे और फ्लैटों का कब्जा सौंपे।
• तब तक, डेवलपर को 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज के रूप में मुआवजा देना जारी रखना होगा।
• बढ़ा हुआ स्टाम्प शुल्क और मुकदमेबाजी का खर्च (₹25,000 प्रति मामला) भी डेवलपर को ही वहन करना होगा।
Legal guide for property buyers
फ्लैट खरीदारों के हक में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कोई भी बिल्डर अपने ग्राहकों को बिना ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) के फ्लैट लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। न्यायालय ने पारस्वनाथ डेवलपर्स की दलीलों को खारिज करते हुए उन्हें देरी के लिए ग्राहकों को 8% ब्याज देने का आदेश दिया है।
Key points for property buyers
1. यदि आपके बिल्डर ने आपसे किसी ऐसे कागज़ पर हस्ताक्षर करवाए हैं जो केवल बिल्डर के फायदे की बात करता है (जैसे देरी पर नाममात्र का मुआवजा), तो घबराएं नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे 'एकतरफा अनुबंध' उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अवैध हैं। इसका मतलब हुआ कि इस प्रकार का एग्रीमेंट, सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है फिर चाहे उसे पर कितनी भी स्टैंप ड्यूटी क्यों न दी गई हो।
2. कानून के अनुसार, बिना OC के कब्जा देना और लेना दोनों जोखिम भरे हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि जब तक बिल्डर के पास सक्षम प्राधिकारी से OC न हो, वह कब्जा देने का प्रस्ताव नहीं दे सकता।
3. यदि बिल्डर ने फ्लैट देने में देरी की है, तो आप केवल अनुबंध में लिखे नाममात्र मुआवजे के हकदार नहीं हैं, बल्कि न्यायालय से उचित ब्याज दर (जैसे इस मामले में 8%) की मांग कर सकते हैं। यानी कि मुआवजा अनुबंध के आधार पर नहीं बल्कि नियम के आधार पर मिलेगा।
4. यदि कब्जे में देरी के कारण स्टाम्प ड्यूटी या रजिस्ट्रेशन फीस बढ़ जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के अनुसार, वह अतिरिक्त बोझ बिल्डर को ही उठाना होगा।
Legal Expert advice:
घर खरीदारों को सलाह दी जाती है कि वे भुगतान का पूरा रिकॉर्ड रखें और कब्जे के समय OC की मांग अनिवार्य रूप से करें। यदि बिल्डर नियमों का उल्लंघन करता है, तो उपभोक्ता आयोग (NCDRC) एक प्रभावी मंच है।

.webp)