चेन्नई, 21 फरवरी 2026: मद्रास हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के पदोन्नति अधिकारों को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण जजमेंट दिया है। मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारत के समस्त केंद्रीय कर्मचारियों और राज्य सरकार के विभिन्न कर्मचारियों के लिए काफी लाभदायक होगा। अदालत ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी को दिया गया लघु दंड (minor penalty) समाप्त हो चुका है, तो विभाग 'जांच अवधि' (check period) का हवाला देकर उसे पदोन्नति से वंचित नहीं कर सकता।
पहले वेतनवृद्धि फिर पदोन्नति पदोन्नति रोकी
यह मामला विद्यालय शिक्षा विभाग के एक कर्मचारी से संबंधित है। वर्ष 1985 में उसके विरुद्ध एक आरोपपत्र जारी किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप उसकी एक वेतनवृद्धि (increment) एक वर्ष के लिए रोक दी गई थी। जब अप्रैल 1987 में विभाग ने अधीक्षक पद के लिए पदोन्नति सूची तैयार की, तो कर्मचारी का नाम उसमें शामिल नहीं किया गया। कर्मचारी के आवेदन और अभ्यावेदन पर भी कोई विचार नहीं किया गया।
कर्मचारी की मांग
कर्मचारी ने वर्ष 2017 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर 1 अप्रैल 1987 से अधीक्षक पद पर काल्पनिक पदोन्नति (notional promotion) और उसके बाद 5 दिसंबर 1991 से जिला शैक्षिक अधिकारी के निजी सहायक पद पर परिणामी पदोन्नति की मांग की थी।
अदालत में विभाग के तर्क
विभाग ने अपनी पुनर्विचार याचिका में तर्क दिया कि 1987 की पदोन्नति सूची तैयार करते समय कर्मचारी पर आरोपपत्र लंबित था और दंड की अवधि प्रभावी थी। विभाग का यह भी कहना था कि 1985 में दिए गए दंड के कारण कर्मचारी का नाम पदोन्नति सूची से बाहर रखना विधिसम्मत था और वे पांच वर्ष की तथाकथित जांच अवधि के नियमों का पालन कर रहे थे।
हाई कोर्ट की टिप्पणी और निर्णय जस्टिस सी. वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. विजयकुमार की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि कर्मचारी को दिया गया दंड मार्च 1986 में ही समाप्त हो चुका था। अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड समाप्त होने के बाद पदोन्नति रोकने के लिए 'जांच अवधि' का सहारा लेना पूरी तरह से अवैध है।
कोर्ट ने अपने निर्णय में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया
• 'वी. रानी' मामले का संदर्भ: अदालत ने 'पुलिस उप महानिरीक्षक एवं अन्य बनाम वी. रानी' मामले के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि दंड अवधि खत्म होने के बाद पदोन्नति रोकने के लिए कोई 'जांच अवधि' लागू नहीं की जा सकती।
High Court Rules That Promotion of Government Employees Cannot Be Withheld on the Pretext of Check Period
खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ द्वारा कर्मचारी को 1987 से काल्पनिक पदोन्नति देने का निर्णय बिल्कुल सही था, क्योंकि विभाग के पास उसे पदोन्नति से वंचित करने का कोई वैध आधार नहीं था। अदालत ने विभाग की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई त्रुटि नहीं है जो पूर्व के आदेश को बदलने के लिए पर्याप्त हो।
इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी विभाग मनमाने ढंग से पुराने दंडों को आधार बनाकर भविष्य की पदोन्नतियों में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते। यदि दंड की अवधि पूरी हो चुकी है, तो कर्मचारी पदोन्नति पर विचार किए जाने का पूर्ण हकदार है।

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