भोपाल, 21 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की नींव मजबूत करने वाले अतिथि शिक्षकों के भविष्य पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हाल ही में शिक्षा विभाग द्वारा जारी एक नए आदेश (क्रमांक/467, दिनांक 20.02.2026) ने प्रदेश भर के अतिथि शिक्षकों में आक्रोश और असुरक्षा की लहर पैदा कर दी है।
क्या है नया सरकारी आदेश?
सरकार के इस ताज़ा फरमान के मुताबिक, यदि कोई अतिथि शिक्षक लगातार एक सप्ताह से अधिक समय तक विद्यालय से अनुपस्थित रहता है, तो उसे बिना किसी देरी के तत्काल पोर्टल से रिलीव (सेवामुक्त) कर दिया जाएगा। इस आदेश ने अतिथि शिक्षकों को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ उनकी नौकरी एक धागे से लटकी नज़र आ रही है।
MP Guest Teachers Oppose New DPI Order
अतिथि शिक्षक समन्वय समिति के प्रदेश सचिव, रविकांत गुप्ता ने इस आदेश को "अमानवीय और अव्यवहारिक" करार दिया है। उन्होंने सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार यह भूल रही है कि अतिथि शिक्षक भी इंसान हैं, मशीन नहीं।
समिति ने सरकार के सामने कुछ तीखे सवाल रखे हैं:
• क्या अतिथि शिक्षक बीमार नहीं हो सकते?
• क्या उनके परिवार के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है?
• यदि किसी शिक्षक का एक्सीडेंट हो जाए या परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए, तो क्या उसे सीधे नौकरी से निकाल देना ही न्याय है?
शोषण और असुरक्षा का माहौल
सूत्रों के अनुसार, अतिथि शिक्षक पहले से ही अस्थायी सेवा, कम मानदेय और भविष्य की अनिश्चितता के कारण भारी मानसिक दबाव में हैं। उन्हें डर है कि इस नए नियम का स्कूल प्रशासन द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है। बिना किसी लिखित सूचना, स्पष्टीकरण का मौका दिए या निष्पक्ष जांच के बिना की जाने वाली यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर संकट विशेषज्ञों का मानना है कि भय और असुरक्षा के इस माहौल में "गुणवत्तापूर्ण शिक्षा" की उम्मीद करना बेमानी है। जब शिक्षक खुद को दिहाड़ी मजदूर जैसा महसूस करने लगे और हर वक्त नौकरी जाने के डर में रहे, तो वह छात्रों के भविष्य के साथ न्याय कैसे कर पाएगा?
अब क्या होगा
आंदोलन की चेतावनी अतिथि शिक्षक समन्वय समिति ने सरकार से मांग की है कि इस आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए या इसमें मानवीय संशोधन किए जाएं। समिति का कहना है कि किसी भी कार्रवाई से पहले लिखित सूचना और जांच अनिवार्य होनी चाहिए।
यदि सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती है, तो प्रदेश के हजारों अतिथि शिक्षक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष और आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इन "शिक्षा के प्रहरियों" की मानवीय संवेदनाओं को समझते हुए अपने आदेश में बदलाव करती है, या विवाद और गहराता जाएगा।

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