शिक्षा को चीप बनाने की ये कौन सी हरकतें हैं My Opinion by Manoj Shrivastava

Updesh Awasthee
लोकतंत्र ने एक नई प्रकार की निरंकुशता पैदा की है, एक राजा की नहीं, बल्कि जनसमूह की। संख्यात्मक श्रेष्ठता ही सही-गलत की एकमात्र निर्णायक बन गई है। औसत का इतना वर्चस्व है कि मीडियाक्रिटी  सामान्यीकृत हो चुकी है। मौलिक विचारक हाशिए पर धकेल दिए गये हैं। मास कल्चर में अब जबानदराजों की ज़िंदाबाद है। 

यूनिवर्सिटी एडमिशन में स्टैंडर्ड कंप्रोमाइज

सबसे बड़े जनसांख्यिकीय समूहों को आकर्षित करने के लिए योग्यता-आधारित नीतियों को नजरअंदाज करना हर जगह दस्तूर बन गया है। विश्वविद्यालय बड़े संख्या समूहों को समायोजित करने के लिए प्रवेश मानकों को ही कम कर दे रहे हैं। वैधता संख्याओं के माध्यम से निर्धारित हो रही है। मानकों को बनाए रखने के बजाय संख्यात्मक मांगों को संतुष्ट करने के लिए Entry barriers कम किये जा रहे हैं। अच्छा शासन, बुद्धिमान निर्णय, सक्षम प्रशासन वही है जो voter base को आकर्षित करता हो। 

जहाज में क्रू की संख्या हमेशा ही कप्तान से अधिक होती है

प्लेटो का ‘द रिपब्लिक’ पुस्तक में दिया उदाहरण बेसाख़्ता याद आता है। वही जहाज वाला। जहाज में क्रू की संख्या हमेशा ही कप्तान से अधिक होती है। मान लो क्रू के सदस्य तय करते हैं कि नेविगेशन का निर्णय जनतांत्रिक तरह से हो। वे चुनते हैं ऐसे बंदे का Favourable winds का भी वादा करता है और easy sailings का भी। जो वास्तव में कुशल व जानकार नेविगेटर है, उसे एलिटिस्ट बता दिया जाता है। प्लेटो कहते हैं कि जहाज को क्रेश होने से कोई नहीं रोक पाता। 

सो अब ऐसे लोग हैं जो क्षमता की अवधारणा को ही एलिटिस्ट बता रहे हैं। उन्हें प्रतिभा hierarchical लगने लगी है। 

प्लेटो कहता था कि: 
शासन episteme यानी ज्ञान से होता है, न कि सिर्फ doxa यानी राय से। 

राय, ज्ञान की मॉब लिंचिंग कर देगी

राय सभी के पास है, ज्ञान नहीं। अतः ज्ञान को राय के सामने घुटने टेकने ही टेकने हैं। 
राय, ज्ञान की मॉब लिंचिंग कर देगी। 
ज्ञान होता कौन है हमें राय देने वाला। हम से बड़ा रायबहादुर कौन? 
यों धीरे-धीरे अज्ञान का संस्थानीकरण होता जाता है। 
परिसर जिन्हें शिक्षा और विद्या के लिए होना था वे बदतमीज़ी के ईको-चैंबर्स बन जाते हैं।
यों वह समय आता है जब जो सबसे कम जानता है वह सबसे ज्यादा आत्मविश्वासी होता है।
देखिए कि हमारे देखते ही देखते ज्ञान की अभीप्सा और उसके लिए परिश्रम के मूल्य कैसे हवा हो गये? 

वोक ने हमें बस्ते के बोझ से इतना आतंकित किया कि एक समय नो-डिटेंशन नीति के तहत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा हमारे बच्चों ने बिना परीक्षा के उत्तीर्ण कर ली। देखिये कि कैसे -40 पर भी व्यवस्था आपको समंजित करने के लिये उत्सुक और उत्साहित है। देखिये कि पढ़ने वाले के विरुद्ध कैसे कैसे ट्रेप बिछाये जा रहे हैं। दुनिया भर की कंपनियाँ टेलेंट रिक्रूटमेंट और रिटेंशन की नीतियाँ ला रही हैं पर हम टेलेंट डेवलपमेंट को अभिजातवादी मानकर उनका निर्वासन करने के अभियान में लगे हैं। 
शिक्षा को मुफ्त बनाना समझ आता था पर शिक्षा को चीप बनाने की ये कौन-सी हरकतें हैं?
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव, भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी हैं।
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