पहले मुझे लगता था कि कुछ लोग ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मणों के विरुद्ध इतनी बकवास कैसे कर लेते हैं। सेल्फ़ गोल की बीमारी है या यह स्वयं को वर्ण सीमा से परे दिखाने की वही छद्म आधुनिकता जिसके चलते हमारे मध्यवर्गीय परिवारों की माएँ बड़ी इतराकर कहती हैं कि हमारे बेटे को हिन्दी नहीं आती। यह किसी योग्यता के होने पर गर्व नहीं है। यह उसके न होने पर, उसकी अनुपस्थिति पर गर्व है। अपनी जड़ों से दूर होने का गर्व। जो खोया है, उसे उपलब्धि बताने का अहसास। वह कि जो उस भाषा को बोल या लिख नहीं सकता जिसमें उसकी दादी गाया करती थीं, वह आधुनिक होने, सॉफिस्टिकेटेड और ज्यादा arrived होने (मैं इसका अनुवाद “ पहुँचे हुए” होने की तरह करूँ तो उसे व्यंग्य न समझें) के प्रमाण की तरह लगता है। दूसरों के मूल्यों का आंतरिकीकरण कर मोक्ष को प्राप्त हो जाना। किसी जेनुइन आत्म-समीक्षा से नहीं।
Ex-IAS Manoj Shrivastava’s Study on Brahmins Who Oppose Brahmins
कुछ लोगों को कुछ वृत्तों (circles) से अनुमोदन प्राप्त करने के लिए एक तरह की सोशल पर्फार्मेंस देनी पड़ती है पर वह ज्ञान नहीं है। कुछ लोग एक तरह का आत्म-निषेध करते हैं, आप उसे बौद्धिक masochism कह सकते हैं। आत्म-प्रताड़ना का आनन्द। ये अपने तिरस्कार (denunciation) को अपने क्रिडेंशियल्स की तरह वापरते हैं। ये जितना खुद पर चाबुक फटकारेंगे, उतना ही एक कथित रूप से प्रगतिशील कॉस्मोपॉलिटन क्लास में अपना H1B वीसा प्राप्त कर रहे होंगे। इन्हें हमेशा एक दर्शक-वर्ग चाहिए। अन्यथा जब अकेले होंगे, घर पर होंगे, कोई देख नहीं रहा होगा तो ये उन्हीं कर्मकांडों को खुद कर भी लेंगे।
मुझे लगता था कि स्मृतियों ने पंक्तिदूषक या अपांक्तेय ब्राह्मणों की एक श्रेणी बताई थी तो यह वैसी ही कोई बात होगी। अब समझ आया कि ये वे हैं जो अपना substance खो चुके हैं क्योंकि इन्हें अपनी पंक्ति ही अच्छी नहीं लगती। इन्हें किसी ने पंगत से निकाला नहीं है। ये खुद ही एक आत्म-निर्वासन का रस ले रहे हैं।
पर फिर मुझे लगा कि मैं ही मनुस्मृति और गीता के मैसेज का ध्यान नहीं रख रहा, इसलिए यह संभ्रम मुझे हो रहा है।
ब्राह्मण होना किसी उपनाम का होना नहीं है, वह वेदाध्ययन का होना है:
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वं आशु गच्छति सान्वयः॥
मनु ज्ञान को ही ब्राह्मणत्व कहते हैं। यानी ब्राह्मणत्व कोई जड़ चीज नहीं है। वह एक गतिशील ओरिएंटेशन है। पहले मुझे लगता था कि वेदाध्ययन पर मनु का आग्रह किसी text का आग्रह नहीं है, वह ज्ञान का आग्रह है क्योंकि विद् शब्द का अर्थ जानना है।
पर अब लगता है कि वेद के एक विशिष्ट ग्रंथ चतुष्टय के रूप में कहे का महत्त्व और ज़्यादा है। उससे पता लगता है कि हमारी spiritual lineage से हमारी सम्बद्धताएँ क्या हैं ?
लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड ऑफिसर हैं।

