नई दिल्ली, 25 फरवरी, 2026 : यदि किसी सरकारी कर्मचारी का एक्सीडेंट हो जाता है। इसमें उसकी मृत्यु हो जाती है तो, उसके आश्रित को मुआवजा तो मिलेगा लेकिन यदि सरकार ने कोई मुआवजा दिया है तो फिर इंश्योरेंस क्लेम सेटल नहीं किया जाएगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को बड़ा फैसला सुनाया है।
Dependents Not Entitled to Full Insurance Amount After Employee’s Death, Rules Supreme Court
यह मामला 2 नवंबर 2009 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। हरियाणा सरकार के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत श्रीमती होम देवी की एक जीप की टक्कर के कारण मृत्यु हो गई थी। मृतक का मासिक वेतन 21,805 रुपये था। रोहतक स्थित MACT ने 2010 में परिजनों को 8.80 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने बाद में इस राशि को बढ़ाकर 29,09,240 रुपये कर दिया, लेकिन यह आदेश भी दिया कि 2006 के नियमों के तहत मिलने वाली सहायता राशि इसमें से घटाई जाएगी।
हालांकि, हाई कोर्ट ने बाद में एक 'स्पष्टीकरण आवेदन' (Clarification Application) पर सुनवाई करते हुए अपने ही फैसले को पलट दिया और कहा कि पूरी सहायता राशि को घटाया नहीं जाएगा। इसी विरोधाभास को चुनौती देने के लिए बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट के तर्क और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
1. अदालत ने 'रिलायंस जनरल इंश्योरेंस बनाम शशि शर्मा' मामले का हवाला देते हुए कहा कि पीड़ितों को उनके नुकसान की पूरी भरपाई मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें एक ही वित्तीय नुकसान के लिए दो अलग-अलग स्रोतों से दोहरा लाभ (double recovery) नहीं मिलना चाहिए। नुकसान की डबल रिकवरी नहीं होनी चाहिए।
2. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2006 के नियमों के तहत मिलने वाली वह सहायता जो सीधे 'वेतन और भत्तों' (Pay and Allowances) के बदले दी जाती है, केवल उसे ही मुआवजे से घटाया जाना चाहिए। इसके विपरीत, पेंशन, जीवन बीमा, भविष्य निधि (PF) या अन्य भत्ते जो सीधे वेतन का विकल्प नहीं हैं, उन्हें मुआवजे की राशि से नहीं घटाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को उसकी मर्यादा बताई
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा 'स्पष्टीकरण' के माध्यम से मुआवजे की राशि में किए गए बड़े बदलावों की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 151 और 152 के तहत केवल लिपिकीय (clerical) या गणितीय गलतियों को सुधारा जा सकता है, लेकिन इसके जरिए किसी फैसले के मुख्य हिस्से या मुआवजे की मात्रा में ठोस बदलाव नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फाइनल ऑर्डर
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के बाद के आदेशों को रद्द करते हुए उसके मूल आदेश (Main Order) को बहाल कर दिया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि:
• दावेदार एक हलफनामा दाखिल कर बताएंगे कि उन्हें 2006 के नियमों के तहत कितनी राशि प्राप्त हुई है।
• ट्रिब्यूनल उस राशि की गणना करेगा और उसे कुल मुआवजे से घटाकर अंतिम भुगतान सुनिश्चित करेगा।
• यदि दावेदारों को नियमों के तहत कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई है, तो वे पूरे मुआवजे के हकदार होंगे।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने निर्धारित किया कि 'हरियाणा अनुकंपा सहायता नियम, 2006' के तहत मिलने वाली वह राशि, जो मृतक के वेतन और भत्तों के नुकसान की सीधी भरपाई करती है, उसे मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल (MACT) द्वारा निर्धारित मुआवजे से घटाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों के सड़क दुर्घटना मामलों में मुआवजे के निर्धारण के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश स्थापित करता है।

