नई दिल्ली, 19 फरवरी 2026: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विद्वान न्यायमूर्ति श्री राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई ने सिविल अपील संख्या 797/2026 में 18 फरवरी 2026 को ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। यह फैसला उन सभी उम्मीदवारों को प्रभावित करेगा जिनके पास वैध घोषित हो चुकी यूनिवर्सिटी की डिग्री है और जो सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई करना चाहते हैं।
प्रियंका कुमारी और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य
यह अपील पटना हाई कोर्ट के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसने बिहार राज्य में लाइब्रेरियन (Librarian) के पद पर कार्यरत अपीलकर्ताओं की सेवा समाप्ति को बरकरार रखा था। अपीलकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2010 में की गई थी, लेकिन 2015 में उनकी सेवाएं इस आधार पर समाप्त कर दी गई थीं कि उनकी बैचलर ऑफ लाइब्रेरी साइंस (B.Lib) की डिग्री 'यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, रायपुर' से थी, जिसे अवैध माना गया।
Core Legal Dispute
अपीलकर्ताओं ने अपनी डिग्री वर्ष 2004 में प्राप्त की थी। जिस विश्वविद्यालय से उन्होंने पढ़ाई की, वह 'छत्तीसगढ़ निजी क्षेत्र विश्वविद्यालय अधिनियम, 2002' के तहत स्थापित था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रोफेसर यश पाल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य' (2005) के ऐतिहासिक मामले में इस अधिनियम की धारा 5 और 6 को असंवैधानिक (ultra vires) घोषित कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे सभी विश्वविद्यालय अवैध घोषित हो गए और अस्तित्व में नहीं रहे।
• अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं ने 2004 में अपनी डिग्री पूरी कर ली थी, जो अधिनियम के रद्द होने से पहले का समय था। उन्होंने 'यश पाल' मामले के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय स्वयं छात्रों के करियर को लेकर सचेत था और उसने तत्कालीन छात्रों को अन्य विश्वविद्यालयों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था, अतः पूर्व में उत्तीर्ण छात्रों की डिग्रियों को भी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
• बिहार सरकार का तर्क था कि एक बार जब अधिनियम को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया गया, तो उस विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई सभी डिग्रियां स्वतः ही अमान्य हो गईं। राज्य का कहना था कि 'यश पाल' मामले में सुरक्षा केवल उन छात्रों को दी गई थी जो उस समय पढ़ाई कर रहे थे, न कि उन्हें जो पहले ही पास हो चुके थे।
Court's analysis and conclusions
उच्चतम न्यायालय ने मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु नोट किए:
1. विश्वविद्यालय की वैधता: जिस समय अपीलकर्ताओं ने पढ़ाई की, उस समय विश्वविद्यालय राज्य अधिनियम के तहत वैध था और केंद्र सरकार द्वारा भी उसकी डिग्रियां मान्यता प्राप्त थीं।
2. छात्रों का दोष: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिनियम के बाद में रद्द होने में छात्रों का कोई दोष नहीं था और ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला कि विश्वविद्यालय "फर्जी" (bogus) था या वहां वास्तव में पढ़ाई नहीं होती थी।
3. राज्य की देरी: राज्य ने 2010 में नियुक्ति के समय इन डिग्रियों को स्वीकार किया था और अपीलकर्ता 5 वर्षों से अधिक समय तक संतोषजनक रूप से कार्य कर चुके थे।
4. यश पाल मामले की व्याख्या: न्यायालय ने माना कि 'यश पाल' निर्णय का उद्देश्य छात्रों के हितों की रक्षा करना था, उन्हें दंडित करना नहीं।
The Verdict of Recognition of university degrees declared invalid
उच्चतम न्यायालय ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। न्यायालय ने आदेश दिया कि:
• अपीलकर्ताओं की सेवा समाप्ति अवैध है और उन्हें सेवा में निरंतरता (continuity of service) के साथ बहाल किया जाए।
• चूंकि उन्होंने बीच की अवधि में कार्य नहीं किया था और इसमें केवल राज्य की ही गलती नहीं थी, इसलिए उन्हें पिछला वेतन (back wages) नहीं दिया जाएगा।
यह निर्णय उन हजारों छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जिनकी डिग्रियां तकनीकी या विधायी कारणों से विवादों में फंस जाती हैं, जबकि स्वयं छात्रों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती।

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