नई दिल्ली, 7 फरवरी 2026: यदि आप Bharti AXA से Insurance Policy लेने जा रहे हैं तो आपको सुप्रीम कोर्ट का यह डिसिशन जरूर पढ़ लेना चाहिए। किस प्रकार कंपनी ने एक गरीब ड्राइवर के परिवार को उचित लाभ देने से इनकार किया। न्याय के लिए उसे सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़नी पड़ी।
Bharti AXA General Insurance Company Limited Supreme Court Case Decision
यह मामला 9 जून 2011 का है, जब चेन्नई में 37 वर्षीय डी. वेलु अपनी दोपहिया गाड़ी पर जा रहे थे। तभी लापरवाही से चलाए जा रहे एक टैंकर लॉरी ने, जिसका बीमा भारती एक्सा जनरल इंश्योरेंस कंपनी के पास था, उन्हें जोरदार टक्कर मार दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। मृतक डी. वेलु पेशे से एक ड्राइवर थे और अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। उनके पीछे उनकी पत्नी वी. पद्मावती, दो छोटे बच्चे और उनके माता-पिता रह गए, जिन्होंने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT), चेन्नई में मुआवजे के लिए याचिका दायर की।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा
शुरुआत में, MACT चेन्नई ने मृतक की आय केवल ₹6,000 मानते हुए ₹9.37 लाख का मुआवजा दिया। जब परिवार ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील की, तो अदालत ने बिना किसी ठोस आधार के आय को ₹7,000 मानकर मुआवजे को मामूली रूप से बढ़ाकर ₹10.51 लाख कर दिया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने "भविष्य की संभावनाओं" के लिए कोई राशि नहीं जोड़ी, जिसे लेकर परिवार ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
बीमा कंपनी ड्राइवर की मासिक आय ₹10000 करने को तैयार नहीं थी
सुनवाई के दौरान पीड़ितों के वकील ने तर्क दिया कि डी. वेलु की मासिक आय ₹10,000 थी, जिसका प्रमाण नियोक्ता (PW-3) द्वारा दिए गए वेतन प्रमाण पत्र (Exhibit P-14) और हलफनामे से स्पष्ट था। दूसरी ओर, बीमा कंपनी के वकील ने ₹10,000 की आय के दावे को सबूतों के अभाव में चुनौती दी और यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय द्वारा "प्यार और स्नेह की हानि" (Loss of love and affection) के लिए दिया गया मुआवजा 'प्रणय सेठी' मामले के कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक हस्तक्षेप और विश्लेषण
उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब रिकॉर्ड पर वेतन प्रमाण पत्र जैसा पुख्ता सबूत मौजूद था, तो आय को कम आंकना गलत था। न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखे:
• मृतक की मासिक आय को आधिकारिक तौर पर ₹10,000 स्वीकार किया गया।
• 'प्रणय सेठी' मामले के अनुसार, 40 वर्ष से कम उम्र के निश्चित वेतन पाने वाले व्यक्ति के लिए 40% भविष्य की वृद्धि जोड़ना अनिवार्य है, जिसे उच्च न्यायालय ने नजरअंदाज किया था।
• न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "प्यार और स्नेह की हानि" को अलग मद के बजाय "कंसोर्टियम" (Spousal, Parental and Filial) के तहत दिया जाना चाहिए।
ड्राइवर के परिवार को सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिला
सुप्रीम कोर्ट ने सभी गणनाओं के बाद कुल मुआवजा ₹20,80,000 निर्धारित किया। इसमें मृतक की पत्नी के लिए ₹50,000 (Spousal Consortium), बच्चों के लिए ₹80,000 (Parental Consortium) और मां के लिए ₹40,000 (Filial Consortium) शामिल हैं। चूंकि मृतक के पिता की मृत्यु 2019 में हो गई थी, इसलिए उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया।
वी. पद्मावती और अन्य बनाम भारती एक्सा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड का फैसला
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने माना कि मद्रास उच्च न्यायालय ने मृतक की वास्तविक आय और भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) को नजरअंदाज कर "न्यायपूर्ण मुआवजा" देने में चूक की थी। न्यायालय ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह बढ़ा हुआ मुआवजा 9% वार्षिक ब्याज के साथ 12 सप्ताह के भीतर जमा करे। जस्टिस दत्ता ने अंत में टिप्पणी की कि कोई भी राशि जीवन की कमी को पूरा नहीं कर सकती, लेकिन यह परिवार के वित्तीय बोझ को कम करने का एक प्रयास है।

