जबलपुर, 18 जनवरी 2026: पब्लिक सोशल मीडिया पर अक्सर कहती है, भ्रष्टाचार के आरोप में बड़े अधिकारी और नेताओं को कभी सजा नहीं होती"। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह कानून की कमजोरी का फायदा उठा लेते हैं। हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ लेकिन माननीय न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकरी ने भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को कानून की कमजोरी का फायदा उठाने नहीं दिया। अब साहब को कोर्ट में खड़े होकर लोकायुक्त के वकील के सवालों का जवाब देना पड़ेगा। यदि अपराध साबित हो गया तो जेल जाना पड़ेगा।
बिजली कंपनी के रिटायर्ड AGM प्रदीप चौधरी की कहानी
याचिकाकर्ता प्रदीप चौधरी 15 जून 2012 को मध्य प्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MPMKVVCL) में अतिरिक्त महाप्रबंधक (Additional General Manager) के रूप में पदस्थ हुए थे, जो एक प्रथम श्रेणी (Class-I) का पद है। उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2020 तक इसी पद पर कार्य किया। उनके खिलाफ एक शिकायत दर्ज की गई थी कि उनके पास 70 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जो उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से बहुत अधिक (Disproportionate) थी।
प्रदीप चौधरी लोकायुक्त की जांच में भ्रष्टाचार के दोषी पाए गए
इस शिकायत के आधार पर, मध्य प्रदेश शासन की विशेष स्थापना लोकायुक्त द्वारा 25 जुलाई 2014 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धारा 13(1)(e) और 13(2) के तहत अपराध क्रमांक 340/2014 दर्ज किया गया। लंबी जांच के बाद, 10 सितंबर 2022 को उनके खिलाफ चार्जशीट (Final Report) पेश की गई।
पढ़िए कितनी छोटी बात का फायदा उठाकर पूरी कार्रवाई रद्द करवाना चाहते थे
भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी प्रदीप चौधरी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चार्जशीट और कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। याचिका में उन्होंने तर्क दिया कि "उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी (Prosecution Sanction) अक्षम प्राधिकारी (Incompetent Authority) द्वारा दी गई थी।" श्री चौधरी के अनुसार उनको सेवा से हटाने की शक्ति केवल MPMKVVCL के प्रबंध निदेशक (Managing Director) के पास थी, लेकिन मंजूरी आदेश संयुक्त निदेशक (Joint Director) द्वारा जारी किया गया था, जो याचिकाकर्ता के समकक्ष पद पर थे।
लोकायुक्त के वकील ने गजब की दलील दी
याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को नोटिस जारी करके अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कहा था। लोकायुक्त के वकील ने तर्क दिया कि मंजूरी आदेश के साथ कोई प्रथम दृष्टया अवैधता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंजूरी के मामले पर वास्तव में प्रबंध निदेशक (MD) द्वारा विचार किया गया था और उनके द्वारा ही इसे अनुमोदित (Approved) किया गया था। संयुक्त निदेशक के हस्ताक्षर केवल आदेश के औपचारिक प्रमाणीकरण (Formal Authentication) के लिए थे।
यह भी तर्क दिया गया कि मंजूरी की वैधता का प्रश्न ट्रायल के दौरान साक्ष्य (Evidence) का विषय है और इसे इस प्रारंभिक स्तर पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन की मंजूरी सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी गई थी या नहीं, यह साक्ष्य का विषय (Matter of Evidence) है और इसका निर्णय ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।
रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि संयुक्त निदेशक द्वारा दी गई मंजूरी को प्रबंध निदेशक ने अपनी मंजूरी दे दी थी, जो याचिकाकर्ता को हटाने के लिए सक्षम प्राधिकारी थे।
कोर्ट ने कहा कि धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग किसी कानूनी अभियोजन को रोकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट को इस मामले में लोकायुक्त द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में कोई दुर्भावना या प्रक्रिया का दुरुपयोग नजर नहीं आया। अंततः, हाई कोर्ट ने प्रदीप चौधरी की याचिका को खारिज कर दिया।
निष्कर्ष: मुद्दे की बात
विद्वान न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और अजय कुमार निरंकरी ने स्पष्ट कर दिया कि, प्रक्रिया में किसी छोटी सी गलती के कारण अपराध को शून्य नहीं माना जा सकता है। भ्रष्टाचार का आरोप लगा है, जांच में भ्रष्टाचार पाया गया है, इसलिए कोर्ट में कैसे तो चलेगा। अभयोजन की अनुमति किसने दी और उसे अनुमति देने का अधिकार है या नहीं, इस बात पर अलग से विचार करेंगे। लेकिन यदि किसी अनाधिकृत व्यक्ति ने अभियोजन की अनुमति दे दी है तो केवल इस बात से भ्रष्टाचार का आरोप खत्म नहीं होता।
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