HIGH COURT ने बिना कारण गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड करने के आदेश दिए

Updesh Awasthee
विधि संवाददाता, प्रयागराज
: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उसकी गिरफ्तारी का कारण बताया जाना जरूरी है। पुलिस अधिकारी, अपराधियों की तरह किसी को उठाकर नहीं ले जा सकते। इसी के साथ कारण बताए बिना एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड करने और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। 

यह है मामला 
न्यायालय में प्रस्तुत की गई कहानी के अनुसार, 28 नवंबर 2025 शाम लगभग 5:40 बजे याचीगण (उमंग रस्तोगी और सिद्धार्थ रस्तोगी) के पिता को एसओ गौतमबुद्धनगर ने दिल्ली स्थित उनके व्यापारिक परिसर से उठा लिया। गौतम बुद्ध नगर पुलिस स्टेशन में पांच दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया और बाद में बीएनएस की धारा 317(2) के तहत एफआइआर दर्ज कर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष विलंब से पेश किया गया।

मजिस्ट्रेट ने खारिज किया, हाई कोर्ट में चुनौती दी  

याचीगण के पिता ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की तो पुलिस ने 26 दिसंबर 2025 को हल्द्वानी उत्तराखंड से याची संख्या एक (उमंग रस्तोगी) को बिना कारण बताए गिरफ्तार कर लिया। उसे गौतम बुद्ध नगर में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, लेकिन गिरफ्तारी मेमो की प्रति नहीं दी गई। उसके वकील ने उसी दिन उसकी रिहाई के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जो संबंधित मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दिया। इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।

कोर्ट ने जताई नाराजगी  
कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो के क्लॉज 13 में पुलिस को विशेष विवरण दर्ज करने की आवश्यकता है, जिसमें आरोपित की संलिप्तता को दर्शाने वाले सामग्री उल्लिखित होती है, लेकिन सब इंस्पेक्टर ने केवल इतना नोट किया कि आरोपित को अपराध और लागू धाराओं के बारे में सूचित करने के साथ ही उसके पिता को टेलीफोन द्वारा सूचित किया गया है। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक को भी अनुपालन के लिए भिजवाने का निर्देश दिया है। 

हाई कोर्ट का आदेश 
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ तथा न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने डीजीपी को ऐसे अधिकारियों को निलंबित कर उनके खिलाफ विभागीय जांच कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा, गिरफ्तारी के समय पुलिस को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देनी चाहिए, यह संविधान के अनुच्छेद 22 में प्राप्त मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा समय आ गया है कि उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए जो धारा 50 और 50ए / धारा 47, 48 बीएनएसएस का उल्लंघन कर रहे हैं। 

इसके अलावा, उमंग रस्तोगी और सिद्धार्थ रस्तोगी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) का रिमांड आदेश और 27 दिसंबर 2025 का आदेश रद करते हुए उमंग को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया है। हालांकि प्रतिवादियों को अनुमति दी है कि वह कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं। 
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