रिश्वत का लालच सरकारी अधिकारियों को अंधा और अपराधी बना देता है। सातवां वेतनमान के तहत योग्यता से अधिक वेतन मिलने के बावजूद सिर्फ ₹50000 की रिश्वत के कारण एक इंजीनियर की 1.38 करोड़ की संपत्ति कुर्क हो गई। कुर्की की कार्रवाई ED द्वारा की गई है जबकि इंजीनियर और उनकी पत्नी को CBI की चार्जशीट का सामना करना पड़ रहा है।
इंजीनियर धनंजय प्रसाद चतुर्वेदी की CBI से शिकायत
यह मामला भोपाल के रिटायर्ड गैरिसन इंजीनियर धनंजय प्रसाद चतुर्वेदी और उनकी पत्नी शिप्रा चतुर्वेदी के भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित है। सबसे पहले, जून 2022 में ग्वालियर के मुरार केंटोनमेंट स्थित मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (एमईएस) में गैरिसन इंजीनियर के पद पर तैनात धनंजय प्रसाद चतुर्वेदी एक रिश्वत घोटाले में फंस गए। एक महिला ठेकेदार को 84 लाख रुपये का निर्माण कार्य का ठेका मिला था। ठेका मिलने के बाद धनंजय ने महिला के पति से ठेके की राशि का 5 प्रतिशत (यानी 4 लाख 20 हजार रुपये) रिश्वत की मांग की। मना करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी गई।
CBI ने भोपाल से ग्वालियर जाकर इंजीनियर को गिरफ्तार किया
महिला ठेकेदार के पति ने पहली किस्त के रूप में 50 हजार रुपये देने का फैसला किया, लेकिन इससे पहले उन्होंने सीबीआई (एसीबी) भोपाल के एसपी को शिकायत कर दी। सीबीआई की टीम ने ग्वालियर पहुंचकर एक जाल (ट्रैप) बिछाया। शिकायतकर्ता को 50 हजार रुपये लेकर धनंजय के पास भेजा गया। जैसे ही रिश्वत के रुपये सौंपे गए, सीबीआई टीम ने छापा मारा। धनंजय हड़बड़ा गए और रुपये छिपाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद तलाशी में संदिग्ध दस्तावेज मिले
इसके तुरंत बाद, सीबीआई की टीम ने धनंजय के पास से 9.60 लाख रुपये नकद बरामद किए। लखनऊ और नोएडा में कीमती जमीनों के दस्तावेज भी मिले। टीम ने ग्वालियर के अलावा उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर स्थित उनके घर और दफ्तर पर भी तलाशी ली, जहां से कुछ और संदिग्ध दस्तावेज बरामद हुए। इनकी जांच जारी रही। धनंजय को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्रवाई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट), 1988 की धारा 13(2) र/डब्ल्यू 13(1)(बी) के तहत दर्ज एफआईआर पर आधारित थी।
आय से दोगुनी संपत्ति मिली
गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने गहन जांच शुरू की, जो 1 अप्रैल 2013 से 8 जून 2022 तक की अवधि को कवर करती थी। जांच में पता चला कि धनंजय और उनकी पत्नी शिप्रा चतुर्वेदी के पास 1.38 करोड़ रुपये की बेहिसाब संपत्ति थी। यह राशि उनकी ज्ञात आय के स्रोतों (जैसे वेतन) से 119.08% अधिक थी।
विशेष रूप से, कई बैंक खातों में 46.12 लाख रुपये की नकद जमा राशि पाई गई, जिसे बाद में अचल संपत्तियों (जमीन-मकान) और अन्य प्रॉपर्टी में निवेश किया गया। ये संपत्तियां पद के दुरुपयोग, बेहिसाब नकद जमा, झूठी कृषि आय, आभूषणों की बिक्री, और ट्यूशन आय जैसे काल्पनिक स्रोतों से अर्जित की गई थीं। जांच में यह भी सामने आया कि इन आपराधिक आयों को वैध संपत्ति के रूप में पेश करने के प्रयास किए गए थे।
इस जांच के आधार पर, सीबीआई ने 18 जून 2024 को एलडी स्पेशल कोर्ट (सीबीआई मामलों), भोपाल के समक्ष चार्जशीट (फाइनल रिपोर्ट) दायर की। इसमें धारा 109 आईपीसी, 1860 र/डब्ल्यू धारा 13(1)(बी) और 13(1)(ई) पीसी एक्ट, 1988 के तहत आरोप लगाए गए। यह चार्जशीट मूल एफआईआर पर ही आधारित थी, जो धनंजय के खिलाफ भ्रष्टाचार के लिए दर्ज की गई थी।
नवंबर 2025 में ईडी द्वारा प्रॉपर्टी कुर्क: मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई
अब, नवंबर 2025 में, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के भोपाल क्षेत्रीय कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत धनंजय प्रसाद चतुर्वेदी और शिप्रा चतुर्वेदी से जुड़ी करीब 1 करोड़ 31 लाख रुपये की प्रॉपर्टी को अनंतिम रूप से कुर्क कर लिया। इसमें उनकी अचल संपत्तियां (जैसे जमीन-मकान) और चल संपत्तियां (जैसे बैंक बैलेंस या अन्य निवेश) शामिल हैं।
यह कार्रवाई सीबीआई के मामले और चार्जशीट पर आधारित है, जो भ्रष्टाचार से उत्पन्न आपराधिक आय को वैध बनाने के प्रयासों को लक्षित करती है। ईडी ने जांच में पाई गई बेहिसाब संपत्तियों को सीधे जोड़ा है, और यह कुर्की पीएमएलए के तहत मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के लिए की गई है। मामला अभी अदालत में चल रहा है, और आगे की कार्रवाई जारी है।

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