मध्य प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी मनमानी का नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। एक कर्मचारी से 38 साल तक काम लेने के बाद उसके नियमितीकरण को निरस्त कर दिया गया और बताया गया कि आपकी तो नियुक्ति ही अवैध है। जब आपकी नियुक्ति की गई तब पद रिक्त ही नहीं था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में मुख्य सचिव को नोटिस भेज कर अपने आदेश के पालन की रिपोर्ट मांगी है।
हाई कोर्ट ने नियमित करने को कहा तो अधिकारी ने नियुक्ति अवैध बता दी
याचिकाकर्ता राकेश कुमार चौरसिया, जो उप-संचालक कार्यालय उद्यान, जिला जबलपुर में कार्यरत हैं, ने अपनी याचिका में दर्द भरी दास्तान बयान की। 1987 में दैनिक भोग के रूप में हुई उनकी नियुक्ति को लेकर उन्होंने नियमितीकरण की मांग की थी। हाईकोर्ट ने पहले ही शासन को आवश्यक कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन विभाग ने उल्टा यह फैसला सुनाया कि "उस समय पद स्वीकृत नहीं थे, इसलिए नियुक्ति अवैध है।" चौरसिया के वकील पंकज दुबे और अक्षय खंडेलवाल ने अदालत में तर्क दिया कि 4 दशक की सेवा लेने के बाद अब अवैधता का रोना, रोना अनुचित है। "इतने लंबे समय से अनवरत सेवा लेने के बावजूद स्थायी कर्मचारी का लाभ न देना, न्याय के खिलाफ है।"
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी
कोर्ट ने पूर्व आदेशों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि 10 वर्ष से अधिक सेवा वाले अवैध या अनियमित नियुक्ति वाले कर्मचारियों के लिए स्थायी समिति गठित कर नियमितीकरण की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। एकलपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जो अगली सुनवाई में पेश की जाएगी।
पुराने दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी को नियमितीकरण से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन
इस मामले की तुलना में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कई लैंडमार्क फैसलों में लंबी सेवा वाले दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को राहत दी है। अगस्त 2025 में 'धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक एड-हॉक या दैनिक आधार पर रखे गए वर्कर्स को नियमित नौकरी से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन है।
इसी क्रम में, सितंबर 2025 के एक फैसले में यूपी एजुकेशन कमीशन के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 'सेलेक्टिव रेगुलराइजेशन' की निंदा की और सभी लंबे समय से सेवा दे रहे वर्कर्स को लाभ देने का आदेश दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2025 में एक महत्वपूर्ण फैसले में कॉन्ट्रैक्टुअल वर्कर्स को स्थायी काम के आधार पर रेगुलराइजेशन का अधिकार दिया, जहां लंबी सेवा को आधार बनाते हुए कहा गया कि लगातार परमानेंट वर्क करने वाले को समान वेतन और लाभ मिलना चाहिए।
ये फैसले राकेश चौरसिया जैसे हजारों कर्मचारियों के लिए एक मिसाल कायम करते हैं, जहां कोर्ट ने साफ लहजे में कहा है कि राज्य 'डेली वेज' सिस्टम को अनिश्चितकाल तक नहीं चला सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह निर्देश भी इसी दिशा में एक कदम है, जो विभागीय सुस्ती को झटका देगा।

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