शिवराज सिंह और मोहन भागवत के बीच इन मुद्दों पर बातचीत हुई होगी: Political Secret Matter

Updesh Awasthee
भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत के बीच आज बंद कमरे में लगभग 40 मिनट लंबी बातचीत हुई। इस बैठक में क्या बात हुई सब अपने स्तर पर अनुमान लगा रहे हैं हम आपको बताते हैं कि वह कौन से मुख्य बिंदु है जो इन दोनों के बीच में विचार का विषय रहे होंगे:- 

वह मुद्दे जो दोनों के बीच विचार का विषय बने

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर अध्ययन करने वाले श्री कमल किशोर के अनुसार वर्तमान में ऐसे कुछ प्रमुख बिंदु है जिन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गंभीरता से विचार किया जा रहा है और उच्च स्तर के लिए चिंता का विषय हो गए हैं। श्री शिवराज सिंह चौहान, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हैं, केंद्रीय कृषि मंत्री हैं, विद्यार्थी परिषद के पुराने नेता हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए समर्पित भाजपा नेताओं में से एक हैं। इस आधार पर उन मुद्दों का शोधन किया जा सकता है। जो दोनों के बीच में चर्चा का विषय हो सकते हैं:- 
1. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का निर्वाचन। ऐसी स्थिति में पार्टी को शिवराज सिंह की आवश्यकता हो सकती है और नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए श्री शिवराज सिंह प्रस्तावक हो सकते हैं। 
2. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। संघ ने "पंच परिवर्तन" के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की योजना बनाई है। इसके अंतर्गत पार्टी और सत्ता में "पंच परिवर्तन" पर विचार विमर्श। 
3. अमेरिका के दबाव के कारण यदि सरकार उसकी शर्त मान लेती है तो क्या भारतीय किसानों को सुरक्षित किया जा सकता है। क्या भारतीय किसानों को अपने पक्ष में बनाए रखा जा सकता है। 
4. डोनाल्ड मोदी भाई-भाई के कारण हिंदी चीनी भाई-भाई जैसी स्थिति बन गई है। इस स्थिति से निपटने के लिए जो योजना बनाई गई है, उसमें शिवराज सिंह के दायित्व का निर्धारण। 
5. क्या 75 वर्ष पूरे करने वाले नेताओं को प्रमुख पदों से सेवानिवृत्ति कर दिया जाना चाहिए। क्या इस समय किसी भी प्रकार का परिवर्तन उचित होगा।

कृपया नोट कीजिए, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विचारधारा और सत्ता दोनों अनिवार्य हैं। संघ के विचार के अनुसार, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सत्ता में बने रहना आवश्यक है। वर्तमान में जिस प्रकार का वर्ल्ड ऑर्डर बन रहा है और अगले 3 साल तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कारण जो खतरे उत्पन्न होने वाले हैं, वह भारत की जनता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा, दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए संघ को अपनी भूमिका का निर्धारण करना अनिवार्य हो गया है।

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