MAHAKUMBH - अमृत स्नान और शाही स्नान में क्या अंतर है, किसका ज्यादा महत्व है

Bhopal Samachar
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प्रयागराज उत्तर प्रदेश में महाकुंभ चल रहा है। कुंभ 12 वर्ष में एक बार आता है परंतु महाकुंभ 144 वर्ष बाद आता है। साल 2024 प्रयागराज में महाकुंभ। इस अवसर पर "अमृत स्नान" और "शाही स्नान", यह दो शब्द आपने भी सुने होंगे। सवाल उठता है कि "अमृत स्नान" और "शाही स्नान" का क्या अर्थ होता है। "अमृत स्नान" और "शाही स्नान" में क्या अंतर होता है। "अमृत स्नान" और "शाही स्नान" में कौन बड़ा होता है। "अमृत स्नान" और "शाही स्नान" में किसका अधिक महत्व होता है। चलिए अपन आज "अमृत स्नान" और "शाही स्नान" दोनों के बारे में सरल हिंदी भाषा में समझ लेते हैं। 

कुंभ मेला में शाही स्नान कब और कैसे शुरू हुआ

प्रयागराज कुंभ में अथवा महाकुंभ में "शाही स्नान" शब्द 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में आया था। हालांकि, यह पेशवाओं का शासन काल है परंतु स्नान का यह नामकरण कुंभ मेले की संस्कृति पर मुगल काल के प्रभाव को दर्शाता है। शाही एक उर्दू शब्द है इसका अर्थ हिंदी में राजसी एवं अंग्रेजी में Royal होता है। अर्थात जो चीज राजा की संपत्ति है अथवा राज परिवार के लिए आरक्षित है। उसके नाम के आगे शाही शब्द जोड़ दिया जाता था। इस प्रकार यहां शाही स्नान से तात्पर्य हुआ, कुंभ में स्नान करने की वह तिथि जो राजाओं के लिए, उनके परिवार के लिए आरक्षित है। निश्चित रूप से यह विशेष और पवित्र दिन होते हैं। मान्यता है कि कुंभ मेला के दौरान कुछ विशेष तिथियां में प्रयागराज में गंगा स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। सभी प्रकार के कष्ट का निवारण हो जाता है। 

कुंभ मेला में अमृत स्नान कब से शुरू हुआ, किसने शुरू किया

प्रयागराज महाकुंभ 2025 के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संतों की इस आपत्ति को स्वीकार किया कि, स्नान के पवित्र दोनों का नाम "शाही स्नान" उचित नहीं है। यह एक प्रकार के आरक्षण को दर्शाता है। ऐसा लगता है जैसे शाही स्नान का दिन सिर्फ सरकार और सरकारी मेहमानों के लिए आरक्षित है। अथवा कुछ विशेष प्रकार के साधु संतों के लिए आरक्षित है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाही स्नान का नाम बदलकर "अमृत स्नान" कर दिया है। यह नामकरण शास्त्रों के अनुसार भी है क्योंकि ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन विशेष स्थितियों में गंगा नदी के पानी में एल्काइन पावर बढ़ जाती है। यही कारण है की विशेष तिथियां में गंगा नदी के पानी को अमृत के समान माना गया है। 

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