एक आदिवासी नाबालिग लड़की जिसके लिए सरकार को कानून में संशोधन करना पड़ा - Legal GK Today

Bhopal Samachar
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भारत और लोकतंत्र की यही तो खूबसूरती है। यहां न्याय के लिए कोई ना कोई रास्ता निकल ही आता है। यदि सरकार कोई गलत कानून बनाए तो सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण करता है और यदि कभी सुप्रीम कोर्ट, पर्याप्त कानून ना होने के कारण निर्णय ना कर पाए तो सरकार ऐसे कानून में संशोधन कर देती है। आज का मामला कुछ ऐसा ही है। एक आदिवासी नाबालिग लड़की को सुप्रीम कोर्ट न्याय नहीं दे पाया, लेकिन जनता ने उसकी आवाज बुलंद की और सरकार को कानून में संशोधन करना पड़ा। 

Real story of legal struggle in India

मथुरा, एक आदिवासी लड़की थी। उसकी उम्र 14 से 16 वर्ष की थी। वह अपने दो भाइयों में से एक के साथ रह रही थी। मथुरा कभी-कभी नोशी नाम की महिला के साथ घरेलू सहायिका के रूप में काम करती थी। उसकी मुलाकात नोशी के भतीजे अशोक से हुई जो उससे शादी करना चाहता था, लेकिन उसका भाई इस रिश्ते के लिए राजी नहीं हुआ और स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने गया कि उसकी बहन नाबालिग है एवं अशोक और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा उसकी बहन का अपहरण किया जा सकता है। शिकायत मिलने के बाद पुलिस प्रशासन अशोक और उसके परिजनों को थाने ले आई। 

सुरक्षा करने वाली पुलिस ने बलात्कार कर दिया

सामान्य जांच के बाद मथुरा, उसके भाई अशोक और उसके परिवार के सदस्यों को घर वापस जाने की अनुमति दे दी गई। हालाँकि, जब वे जा रहे थे, मथुरा को पुलिस वाले ने पीछे रहने के लिए कहा गया, जबकि उसके रिश्तेदारों को बाहर इंतजार करने के लिए कहा गया। मथुरा के साथ तब दो पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया। जब उसके रिश्तेदारों और एकत्रित भीड़ ने पुलिस चौकी को जलाने की धमकी दी, तो दोनो आरोपी पुलिसकर्मी, गणपत और तुकाराम, अनिच्छा से पंचनामा (साक्ष्य की कानूनी रिकॉर्डिंग) दर्ज करने के लिए सहमत हुए। 

न्यायालय में क्या हुआ इस मामले में जानिए:- 

तुकाराम एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य

सत्र न्यायालय ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने सत्र न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया और आरोपी को क्रमशः एक और पांच साल की कैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने माना कि गंभीर धमकियों से प्रेरित भय के कारण निष्क्रिय समर्पण को सहमति या इच्छुक संभोग के रूप में नहीं माना जा सकता है। 

संघर्ष नहीं हुआ इसलिए बलात्कार नहीं मान सकते: सुप्रीम कोर्ट

सितंबर 1979 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जसवन्त सिंह, कैलासम और कोशल ने तुकाराम बनाम महाराष्ट्र राज्य पर अपने फैसले में उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया और आरोपी पुलिसकर्मियों को फिर से बरी कर दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मथुरा ने कोई चिंता नहीं जताई थी और यह भी कि उसके शरीर पर चोट के कोई स्पष्ट निशान नहीं थे, जिससे पता चलता है कि कोई संघर्ष नहीं हुआ और इसलिए कोई बलात्कार नहीं हुआ। 

पत्रकारों ने असहमति जताई, जनता एकजुट हो गई

उक्त निर्णय का जनता ने विरोध किया एवं मीडिया में भी काफी चर्चित हुआ इससे संबंधित कुछ और मामले देखने के मिले बहुत से लोगों के बयान आये कि पुलिस हिरासत में युवा पुलिस कर्मी ऐसे ही महिलाओं को बुलाकर बालात्कार करेंगे और उनको सम्मान मिलेगा। जनता द्वारा काफी विरोध होने पर भारत सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन किया जानिए।

सरकार को कानून में संशोधन करना पड़ा

आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1983, 25 दिसंबर 1983 को बने साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (ए) के सामने एक वैधानिक प्रावधान किया, जिसमें कहा गया है कि यदि पीड़िता कहती है कि उसने संभोग के लिए सहमति नहीं दी थी, न्यायालय खंडनयोग्य अनुमान के रूप में यह मान लेगा कि उसने सहमति नहीं दी थी। 

एक के बाद एक कई संशोधन हुए

भारतीय दंड संहिता,1980 की धारा 376 में धारा 376 (ए), धारा 376 (बी), धारा 376 (सी), धारा 376 (डी) जोड़ने के साथ बदलाव आया, जिससे हिरासत में बलात्कार होना दण्डनीय अपराध है। हिरासत में बलात्कार को परिभाषित करने के अलावा, संशोधन ने इसे स्थानांतरित कर दिया। एक बार संभोग स्थापित हो जाने पर आरोप लगाने वाली की ओर से आरोपी पर सबूत का बोझ होगा, इसकी बंद कमरे में सुनवाई होगी एवं पीड़ित की पहचान उजागर करने पर रोक और कड़ी सजा के प्रावधान भी जोड़े गए। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) :- लेखक ✍️बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं विधिक सलाहकार होशंगाबाद) 9827737665

इसी प्रकार की कानूनी जानकारियां पढ़िए, यदि आपके पास भी हैं कोई मजेदार एवं आमजनों के लिए उपयोगी जानकारी तो कृपया हमें ईमेल करें। editorbhopalsamachar@gmail.com
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