भारतीय न्याय व्यवस्था से जूरी प्रणाली को समाप्त कब किया गया था, जानिए - Legal general knowledge

Bhopal Samachar
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When was the jury system abolished in the Indian judicial system

जूरी सिस्टम अर्थात किसी मुकदमे की सुनवाई के लिए 25 से 55 वर्ष की आयु के 12-15 सदस्यों का चयन कर नागरिकों के मतदान द्वारा जूरी के सदस्यों का चयन किया जाता है जिसे जूरी मंडल कहते हैं। जैसे कि भारतीय सिनेमा की रुस्तम मूवी में बताया गया था समाज के अलग अलग लोग होते हैं और वह मुकदमा सुनते है फिर आपस मे हाँ या न का फैसला करते हैं ओर जूरी जज को अपना फैसला बताते हैं। फिर जज अपना फैसला सुनाता है एवं सरकार भी उस फैसले को मानती है। यह प्रथा भारत में भी लागू थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक जममेन्ट द्वारा इसे समाप्त कर दिया गया।

• एक छोटी सी कहानी:- 

के. एम. नानावटी जब 34 वर्ष का था तो उनका पूरा जीवन बदल गया क्योंकि वे एक नोसेना में अधिकारी बन गए थे और सिल्विया से उन्होंने शादी हो गई थी। अपनी पत्नी ओर बच्चों के साथ वे मुम्बई में खुशी से रहने लगे। नानावटी की अनुपस्थिति में अकेलेपन में सिल्विया को उनके मित्र आहूजा से मिली एवं दोनो प्रेम प्रसंग में पड़ गए। 27 अप्रैल 1959 को सिल्विया ने अपने पति नानावटी के सामने यह बात स्वीकार की कि वह आहूजा से प्रेम करती है लेकिन यह डर भी जाहिर किया कि आहूजा उससे शादी नहीं करेगा। 

फिर नानावटी, आहूजा के घर यह पूछने गया कि क्या वह सिल्विया से शादी करेगा ओर उसके बच्चों की जिम्मेदारी उठाएगा, लेकिन वह मुकर गया। गुस्से में नानावटी ने उसके ऊपर गोली चलाई जिससे आहुजा की मौत हो गई। उस समय इस केस में मीडिया द्वारा काफी कवरेज मिला था आखिरकार जूरी सदस्यों ने फैसला नानावटी के पक्ष में सुनाया।

केएम नानावटी बनाम महाराष्ट्र राज्य 

:- उक्त मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने जूरी कमेटी के फैसले को खारिज कर दिया और नानावटी को हत्या का दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस मामले ने यह साबित कर दिया कि प्रभावित जूरी पैनल भी खतरनाक हो सकता है अतः जूरी प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) :- लेखक ✍️बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं विधिक सलाहकार होशंगाबाद) 9827737665

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