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मुक्त अभिव्यक्ति : बारीक लकीर पर मील का पत्थर / EDITORIAL by Rakesh Dubey

आज आप जब इस टिप्पणी को पढ़ रहे हैं, देश का सर्वोच्च न्यायालय अभिव्यक्ति और अवमामना के बीच की बारीक सी लकीर पर मील के पत्थर सी अटल, किसी नजीर पर विचार कर रहा है | यह नजीर सूचना क्रांति के इस युग में, जब अभिव्यक्ति के लिये फेस बुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, के लिए एक बड़ा पायदान होगी | मूल मामला आप सब जानते हैं |अधिवक्ता प्रशांत भूषण को न्यायपालिका के बारे में उनके ट्वीट पर अवमानना का दोषी ठहराये जाने  से उपजा है |

पूरे देश में  इसके बाद अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार और इसकी सीमा को लेकर नये सिरे से बहस छिड़ गयी है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी और समाज के प्रगतिशील तबके के लोग इस अधिवक्ता का समर्थन  और विरोध में अपनी बेबाक टिप्पणियां कर रहे हैं| यहाँ प्रश्न, इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में सवाल न्यायालय की अवमानना कानून के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के इस अधिकार की सीमा क्या है और कहाँ तक है ?

संविधान के अनुच्छेद १९ (१) (ए) में भारत के नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार प्राप्त है, साथ ही यह भी सही है कि यह अधिकार निर्बाध नहीं है। अब सवाल उठता है कि अगर अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी का अधिकार निर्बाध नहीं है तो इसकी ‘लक्ष्मण रेखा’ कहाँ है? क्या संविधान में प्रदत्त इस अधिकार का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति के बारे में अभद्र या अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है जो दूसरों को अपमानित करने वाली हो या किसी समूह को हिंसक रवैया अपनाने के लिये प्रेरित करने वाली हो?

सर्व विदित है कि हाल ही में संविधान में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के संदर्भ में न्यायालय की अवमानना कानून,१९७१  की धारा २ (सी)(१ ) के प्रावधान को चुनौती दी  गई थी। तर्क था कि अवमानना कानून का यह प्रावधान असंवैधानिक है और यह संविधान की प्रस्तावना में प्रदत्त मूल्यों और बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इस धारा के अनुसार न्यायालय को बदनाम करने अथवा उसके प्राधिकार को ठेस पहुंचाने संबंधी किसी सामग्री का प्रकाशन या ऐसा कोई अन्य कृत्य आपराधिक अवमानना है। वैसे न्यायालय की अवमानना कानून तो १९७१  में बना है लेकिन इससे पहले१९५० के दशक से ही अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के सवाल पर न्यायालय ने समय-समय पर अनेक व्यवस्थायें दी हैं।पिछले सप्ताह यह याचिका वापिस ले ली गई ।

भारत के संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार प्रदान किया है। मगर यदि कोई व्यक्ति अनुचित भाषा का प्रयोग करता है तो  देश के प्रचलित अन्य कानूनो  में इस तरह के अपराध के बारे में अलग-अलग प्रावधान भी  मौजूद हैं।

फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया की उपलब्धता के दौर में इन मंचों पर अपलोड पोस्ट की पहुंच काफी दूर तक होती है। अगर इन पर कथित रूप से आपत्तिजनक पोस्ट किये गये हों तो इन पर आपत्तियां उठाये जाने की स्थिति में ऐसी पोस्ट सोशल मीडिया से हटाये जाने से पहले न जाने कितने लोग पढ़ चुके होते हैं और कितने ही इसके स्क्रीन शॉट ले चुके होते हैं। ऐसी स्थिति में इसके प्रभाव की कल्पना की जा सकती है।

शायद इसी कारण देश के सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना पड़ा कि “ ये ट्विट न्यायालय की शक्ति के प्रति असंतोष और निरादर पैदा करने में सक्षम है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।“ इस निर्णय के प्रकाश में घोषित होने वाली सजा इस बात की नजीर होगी कि अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के प्रयोग में संयम जरूरी है और हम खुद ही इस निमित्त एक लक्ष्मण रेखा खींचें |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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