भारत : चीन से यह सीखना जरूरी है | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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भारत : चीन से यह सीखना जरूरी है | EDITORIAL by Rakesh Dubey

आखिर विश्व स्वास्थ्य सन्गठन और चीन ने कुछ सप्ताह बाद एक नए किस्म के कोरोना वायरस का पता लगाने की घोषणा की और पाया गया कि यही वायरस निमोनिया के लिए जिम्मेदार है। यह संक्रमण बड़ी तेजी से, बल्कि अभूतपूर्व ढंग से फैला और उसकी जो प्रतिक्रिया हुई, वह भी उतनी ही अभूतपूर्व थी। तेजी से फैल रही इस महामारी को लेकर दो सवाल तुरंत उठे। पहला, यह रोग कितना जानलेवा है? और दूसरा, क्या इसको नियंत्रित किया जा सकता है? ताजा आंकडे़ बता रहे हैं कि इसने अभी तक तीन सौ से ज्यादा लोगों की जान ले ली है और इससे संक्रमित होने वालों की संख्या हजारों में है। इस रोग की वजह से मृत्यु-दर का ताजा आकलन दो प्रतिशत का है, जैसे-जैसे इसके नए मामले सामने आएंगे, यह आंकड़ा बदल सकता है।

कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता इस रोग को नियंत्रित करने की कोशिशें देरी से शुरू हुईं, लेकिन चीन ने जिस बडे़ पैमाने पर ये कोशिशें कीं, इससे पहले वैसे प्रयास कभी नहीं हुए। 23 जनवरी को चीन ने वुहान समेत 12 शहरों को देश के शेष भाग से काट दिया। सिर्फ एक फैसले के जरिए 5.2 करोड़ लोगों के आस-पास स्वास्थ्य सुरक्षा का घेरा बना दिया गया। आधुनिक इतिहास में यह शायद पहली बार किसी पूरे शहर के दरवाजे इस तरह से बंद कर दिए गए हों, लेकिन तब तक यह वायरस हांगकांग, मकाऊ, ताईवान, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका तक फैल चुका था। भारत के केरल में कोरोना वायरस का पहला मामला वुहान विश्वविद्यालय पढ़ने गए एक छात्र में देखने को मिला और इसके बाद केरल में ही इसके दो मामले सामने आ चुके हैं। कई देशों ने चीन से आने वाले लोगों पर पूरी या आंशिक पाबंदी लगा दी है। 

चीन में ही सार्स का संक्रमण फैला था, जिसे नियंत्रित करने में नौ महीने का समय लग गया था। इसी तरह, हम मैक्सिको से शुरू हुए एच१ एन१  इनफ्लुएंजा को देख सकते हैं। एच१ एन१  के मामले में जहां मृत्यु-दर ०.१ प्रतिशत  थी, वहीं सार्स के मामले में यह १० प्रतिशत थी। मौजूदा कोरोना वायरस की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका संक्रमण तब भी फैल सकता है, जब किसी मरीज में इसके लक्षण बिल्कुल न दिखाई दे रहे हों। इसके कारण इसे नियंत्रित करना और भी मुश्किल हो जाता है। 

कोरोना वायरस की संरचना मूठ लगी हुई तीलियों जैसी होती है। इसमें एक काफी बड़ा आरएनए जीनोम होता है, जिसकी अपने जैसे नए वायरस बनाने की रणनीति अनूठी होती है। यह पक्षियों से लेकर स्तनधारी जंतुओं तक को कई तरह के रोग देता है और इंसानों की श्वास नली को संक्रमित कर देता है। पिछले सप्ताह द लांसेट पत्रिका ने लिखा था कि चीन ने इसकी जीनोम सरंचना की थाह २०१९  में ही पा ली थी। इसका जीनोम यह भी बताता है कि इंसानों को इसने हाल-फिलहाल में संक्रमित करना शुरू किया है। बाद में अमेरिका और फ्रांस ने भी इसका अध्ययन किया।

यह भी जानना जरूरी है कि अभी हमारे पास इस वायरस की कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे तैयार करने के ठोस तरीके को जरूर समझ लिया गया है। इसे काफी कुछ सार्स की वैक्सीन की तरह ही विकसित किया जा रहा है,लेकिन इसकी प्रभावी वैक्सीन तभी विकसित की जा सकेगी, जब इस महामारी को अभी नियंत्रित कर लिया जाए। अगर इस बीच यह महामारी फिर से फैलती है, तो इस काम में तेजी आएगी। भविष्य में इस महामारी का फैलना तीन चीजों पर निर्भर करेगा- जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आवाजाही और तीसरा यह कि इस वायरस में कितनी तेजी से म्यूटेशन होता है।

भारत को इस वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल से सीखने के लिए बहुत कुछ है। यह तो समय ही बताएगा कि वुहान शहर को बंद करने का फैसला प्रभावपूर्ण साबित हुआ या फिर महज तानाशाही भरा। लेकिन अगर यह तरीका खतरनाक वायरस के संक्रमण को रोकने में उपयोगी साबित हुआ, तो भारत में भी ऐसा फ्रेमवर्क और ऐसी क्षमता तैयार करने की जरूरत होगी कि जरूरत पड़ने पर ऐसे किसी सख्त फैसले को बडे़ पैमाने पर लागू किया जा सके। अभी जो हमारा स्वास्थ्य नेटवर्क है, वह कम संख्या में रोगों के मामलों से तो निपट सकता है, लेकिन अगर किसी क्षेत्र में कोई संक्रमण काफी तेजी से फैलता है तो उससे किस तरह निपटा जाएगा यह अभी स्पष्ट नहीं है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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