देश को क्षति पहुंचाती “कंटेंट एजेंसियां” | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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देश को क्षति पहुंचाती “कंटेंट एजेंसियां” | EDITORIAL by Rakesh Dubey

सामाजिक जागरूकता,समाचार, और प्रतिक्रिया भारतीय समाज में स्थान बदल रही है| पहले अख़बार और पत्रिकाएँ विचार बनाने और उन्हें स्थायित्व देने का काम करते थे | ये विचार स्थायी होते थे अब ये काम “मीडिया” और उसकी “कंटेंट एजेंसी” करती हैं | विचार अब स्थाई होने की जगह तुरंत [इंस्टेंट]  बनते  हैं और तुरंत विलीन होने लगते हैं | उदहारण नागरिकता संशोधन कानून कंटेंट एजेंसी ने एक गेंद की तरह बिना सोचे समझे राजनीतिक इशारों पर यह खेल शुरू  कर दिया और उसके नतीजे नहीं सोचे परिणाम आज देश में उम्रदराज पुरुष और स्त्रियां नफरत की वकालत कर रहे हैं जबकि खुद उनके बच्चे उन्हें शांति और विविधता के फायदे समझा रहे हैं।  राजनेताओं की जगह जब कंटेंट एजेंसी सोचती है तो, यही होगा | एजेंसी का ध्यान अपने बिजनेस पर होता है और राजनेता उसकी धुन पर इस पार या उस पार होने लगते हैं|

देश के १ ६७ ४०० करोड़ रुपये वाले मीडिया और मनोरंजन उद्योग  में आजकल इनका बड़ा  योगदान है। समाचार प्रकाशकों से लेकर मनोरंजन कंपनियों तक, फूड एग्रीगेटर से लेकर ई-कॉमर्स जगत की कंपनियों तक सभी 'कंटेंट फर्म' बनना चाहते हैं। मतलब, एक  ऐसी फर्म जो दृश्य-श्रव्य माध्यम में सामग्री प्रस्तुत करे। इनमें सबसे बड़ा और नया नाम है | ६३५ करोड़ रुपये मूल्य की एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया (ईएनआईएल)। यह १०००० करोड़ रुपये मूल्य वाले टाइम्स समूह का हिस्सा है। ईएनआईएल देश के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्क रेडियो मिर्ची का संचालन करती है और उसके राजस्व का ६७ प्रतिशत रेडियो से आता है। २०२४  तक मिर्ची अपने राजस्व का आधा हिस्सा गैर रेडियो कारोबार से हासिल करने की आशा कर रही है। इसमें 'कंटेंट' बेचना भी शामिल है। ऐसी  कंटेट खरीदी बिक्री चुनाव के पूर्व और पश्चात के मन्तव्य व्यक्त करने के लिए राजनीतिक दल करते हैं |

 ऐसा क्यों हो रहा है, यह समझने के लिए हमें अतीत में झांकना होगा। सन १९९०  के दशक के आखिर से लेकर नई सहस्त्राब्दी के शुरुआती समय तक इंटरनेट ने पहले संगीत, फिर समाचार पत्रों, टेलीविजन और फिल्म कारोबार पर जो दबाव डाला, इसका अर्थ माध्यम को लेकर इन सभी के मन में संशय के रूप में उभरा। उदाहरण के लिए समाचार पत्र कंपनियां वर्षों तक खुद को 'कंटेंट फर्म' बताती रहीं। जबकि उनके मुनाफे का ज्यादातर हिस्सा सामान्य मुद्रित उत्पाद से आता रहा। 'कंटेंट' पर्याप्त शोध से हासिल होता है जिसे प्रकाशित करके श्रोताओं को प्रभावित किया जाता है और फिर तमाम माध्यमों से राजस्व जुटाया जाता है।  

अब खुद को 'कंटेंट फर्म' कहकर इनमें से अधिकांश स्वयं को मुद्रित माध्यम के इर्दगिर्द मौजूद नकारात्मक रुझान से बचा रही थीं। पश्चिमी दुनिया में मुद्रित माध्यम सिमट रहा है। यही कारण है कि टेलीविजन और फिल्म कंपनियों ने ऐसा किया। वृद्धि के पारंपरिक दायरे में लगभग सभी मीडिया कंपनियों ने तीन-चार अलग-अलग कारोबारी क्षेत्रों में प्रयास किया। समाचार पत्र रेडियो, स्थानीय टेलीविजन स्टेशनों और इंटरनेट की ओर बढ़े। टेलीविजन कंपनियों ने कंटेंट उत्पादन, डीटीएच या केबल का रुख किया। इसे विविधता कहा गया। ईएनआईएल या डिज्नी या सोनी यही कर रहे हैं। उदाहरण के लिए ईएनआईएल के पास देश के ६३  शहरों में ११०० कर्मचारी हैं और यह आपके यूट्यूब चैनल और कार्यक्रमों के लिए विज्ञापन बेचना, कंटेंट तैयार करना चाहती है।



 अन्यान्य वजहों से जिनमे  चुनाव भी है के साथ दूरसंचार, टेक्नॉलजी, मीडिया और यहां तक कि खुदरा कारोबार कंपनियां तक सभी को दर्शकों की तलाश है। इस दौरान कई छंट जाएंगे। कोई सफल होगा या नहीं, इसकी पहचान करने के लिए यह जांचना होगा कि उनके कारोबार में उपभोक्ता से प्रत्यक्ष संपर्क का तत्त्व है या नहीं।  यहं तक तो सब ठीक है पर जब कंटेंट एजेंसी समूह की राय औए मंशा पर हावी होकर  देश के  मूलाधार पर हमला करने लगे तो सरकार के साथ नागरिकों को भी चेतना चाहिए | अपने लाभ के लिए अर्थ का अनर्थ करती कम्पनियों पर नकेल कसने की तैयारी युद्ध स्तर पर होना चाहिए, वरन जैसा अभी हो रहा है इसे अपरिमित क्षति के अतिरिक्त कोई अन्य परिभाषा नहीं दी जा सकती |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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