आर्थिक मोर्चे की कसौटी और सरकार | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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आर्थिक मोर्चे की कसौटी और सरकार | EDITORIAL by Rakesh Dubey

देश में यह राय बन रही है या बनाई जा रही है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के साथ बेहतर नहीं किया। इस बात पर लगभग सहमति है कि नरेंद्र मोदी ने २०१४  के चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हुए और निकट भविष्य में भी संभावनाएं कुछ अच्छी नहीं नजर आ रहीं। इससे इनकार नहीं कि सरकार ने कई प्रमुख आर्थिक पहलों में गोलमाल किया, संरक्षणवाद को अपनाया और रोजगार तथा व्यापार के मोर्चे पर भी उसका प्रदर्शन कमजोर रहा। सबसे अहम बात यह कि यदि कोई मान लेता है कि इस वर्ष वृद्घि दर ५ प्रतिशत है और अगले वर्ष ६ प्रतिशत  रहेगी तो सन २०२०-२१ तक की तीन वर्ष की अवधि में वृद्घि औसतन ५.७ प्रतिशत रहेगी। यह आंकड़ा मनमोहन सिंह सरकार के अंतिम वर्ष के ६.२ प्रतिशत के स्तर से काफी कम है|

अस्पष्ट बजट भाषण से आपको इसका अंदाजा नहीं मिलेगा। उनका लिखित भाषण कई पूर्ववर्तियों के भाषण से छोटा था लेकिन किसी बात पर जोर देने के लिए उसे दोहराने की आदत के चलते लंबा हो गया। वह मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल के दो चरणों का जिक्र करके मंदी को स्पष्टवादिता से स्वीकार कर सकती थीं। पहले चार वर्ष में औसत वृद्घि दर ७.७ प्रतिशत थी और दोनों अवधि को जोड़ दिया जाए तो यह औसतन ६.९ प्रतिशत है। यह उतार-चढ़ाव बीती चौथाई सदी या उससे अधिक समय से बना हुआ है। सिंह सरकार के कार्यकाल के अंतिम तीन वर्ष में कमजोर वृद्घि दर के पहले तीन वर्ष तक ७.५ प्रतिशत की बढिय़ा औसत वृद्घि हासिल हुई। इसने उस दौर के वैश्विक वित्तीय संकट को भी धता बता दिया। इसी तरह २०००  से २००३  के बीच की ४.२ प्रतिशत  की कमजोर औसत दर के पहले ६.३ प्रतिशत की ऊंची वृद्घि दर देखने को मिली थी। इसके बाद भी वृद्घि में तेजी आई। संक्षेप में वृद्घि धीमी, तेज और दोबारा धीमी हो सकती है और ऐसा कहने में शर्माने की कोई बात नहीं।

मौजूदा दौर में अस्वाभाविक बात यह है कि यह मंदी बिना बाह्य कारणों (कच्चे तेल की ऊंची कीमत और/अथवा मॉनसून की लगातार विफलता) के आई है। जबकि बीते ५०  वर्ष के दौरान हर बार धीमेपन के पीछे ऐसी कोई न कोई वजह थी। मंदी का मौजूदा दौर कहीं अधिक गंभीर है। यदि सबकुछ ठीक होने पर भी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कमजोर है तो मतलब यह कि राज्य सत्ता के साथ ही गड़बड़ी है। यह बात ध्यान देने लायक है कि मोदी ने कौन से सामाजिक आर्थिक बदलाव गढ़े हैं: वित्तीय सेवाओं तक पहुंच में नाटकीय सुधार हुआ है, खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन की व्यवस्था, शौचालय, बिजली, डिजिटल लेनदेन और अब नि:शुल्क चिकित्सा बीमा, किसानों को नकद हस्तांतरण आदि। इसके अतिरिक्त जैसा कि सीतारमण ने कहा कि मूल मुद्रास्फीति समेत वृहद आर्थिक संतुलन सहज है। राजकोषीय चुनौती पर जरूर वह बातें स्पष्ट नहीं कर पाईं और उससे जुड़े प्रश्न अनुत्तरित रह गए। इसके बावजूद परिवहन बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है, यह बात डिजिटल ढांचे के बारे में भी कही जा सकती है। डेटा खपत में जबरदस्त वृद्घि हुई है और उच्च शिक्षा तक लोगों की पहुंच बढ़ी है। अगले कुछ वर्षों में उपरोक्त तमाम आंकड़ों में और सुधार आएगा। इस प्रकार तमाम लोगों का जीवन बदल रहा है। 

मोदी के आलोचक अक्सर इन बदलावों और इनके महत्त्व को स्वीकार करने में चूक जाते हैं। हो सकता है सरकार की नाकामियां अधिक स्पष्ट और मानीखेज हैं: रोजगार के मोर्चे पर खराब होती स्थिति, खपत कमजोर होना, निवेश पर नकारात्मक असर, निर्यात में ठहराव, कई अहम नीतिगत सुधारों को लेकर विधायी निष्क्रियता, किसानों के समक्ष तमाम चुनौतियां आदि इसके उदाहरण हैं। भय और संस्थागत क्षति को इसमें जोड़ा जा सकता है। मोदी और उनके कैबिनेट सहयोगियों को तमाम मसलों पर अपनी आलोचना को सहजता से लेना होगा और रोजगार की समस्या को हल करना होगा। क्योंकि बढ़ती असमानता और वृद्घि के लाभ के असमान से निपटने में यह अहम है। सीतारमण ने अपने भाषण में इनमें से कुछ को हल करने का प्रयास किया लेकिन कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाईं। अभी कई मोर्चों पर काफी कुछ किया जाना चाहिए। इसके लिए अलग तरीके अपनाने होंगे। यदि ये प्रयास बढ़े और वृद्घि में सुधार हुआ तो मोदी सरकार का आर्थिक रिकॉर्ड अभी भी चमक सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भी वृद्घि का अगला दौर आता ही होगा।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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