राजधानी की मलाई वाली कुर्सियों पर अटैच हो गए प्रोफेसर, स्टूडेंट्स लावारिस, मंत्री लाचार | MP NEWS

भोपाल। नियम कायदों की बात करने वाले कैबिनेट मंत्री जीतू पटवारी खेल मंत्री का दायित्व भले ही ठीक प्रकार से निभा रहे हो परंतु उच्च शिक्षा विभाग उनके लिए पार्ट टाइम जॉब से ज्यादा कुछ भी नहीं है। मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा के बिगड़ते हालात को सुधारने में उनकी कोई कोशिश नजर नहीं आ रही है। उच्च शिक्षा विभाग से मोटी तनख्वाह पाने वाले 20 से ज्यादा प्रोफेसर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की मलाई वाली कुर्सियों पर अटैच बैठे हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में इन्होंने इन कुर्सियों पर कब्जा कर लिया था। माफिया के खिलाफ अभियान चलाने वाली सरकार इन प्रोफेसरों के सामने बनी सी नजर आ रही है। यह बात केवल उन सभी प्रोफेसेस की हो रही है जो या तो मंत्रालय में या फिर किसी संचालनालय में अटैच है। जबकि सरकार ने उन्हें कॉलेज में पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था। 

यह है वह प्रोफेसर जो वर्षों से संचालनालय या मंत्रालय में जमे हुए हैं

1. डॉ. वायके अग्रवाल- संयुक्त संचालक हैं। संचालनालय में 2006 से। मूल पद : रीवा इंजीनियरिंग काॅलेज
2. डॉ. अभय कुमार जैन- अतिरिक्त संचालक हैं। 2009 से संचालनायल में हैं। मूल पद : रीवा इंजीनियरिंग काॅलेज
3. डॉ. लक्ष्मी नारायण रेड्‌डी- उप संचालक हैं। 2010 से गैर शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं। मूल पद : महिला पॉलिटेक्निक भोपाल
4. डॉ. एसके पाण्डेय- उप संचालक। 2010 से संचालनालय में हैं। शासकीय इंजीनियरिंग संवर्ग के हैं। मूल पद- आरजीपीवी यूआईटी
5. डॉ. अरुण नाहर- एडमिशन डायरेक्टर। 18 साल से पॉलिटेक्निक के बाहर सेवाएं दे रहे हैं। दो बार तीन-तीन साल के लिए संचालक के प्रभार में रह चुके हैं, जबकि इनका मूल पद प्राचार्य पॉलिटेक्निक है।
6. एसएके राव- उप संचालक हैं। 2004 से गैर शैक्षणिक कार्य में हैं। मूल पद : व्याख्याता पॉलिटेक्निक
7. डॉ. एसबी चौबे- उप संचालक हैं। 2007 से गैर शैक्षणिक कार्य में हैं। करीब 1 साल के लिए एसबी पॉलिटेक्निक गए और वापस लौट आए।
8. डॉ. एमआर धाकड़- रिसर्च ऑफिसर/अपर सचिव। 2008 से गैर शैक्षणिक कार्य में हैं। मूल पद : महिला पॉलिटेक्निक
9. डॉ.एसके गांधी- संचालनालय में 5 साल से हैं। मूल पद : एसबी पॉलिटेक्निक
10. डॉ. आरके जैन, अपर सचिव हैं। 25 साल से गैर शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं। एक साल के लिए उज्जैन इंजीनियरिंग कॉलेज भेजे गए थे।
11. डॉ. एनके शर्मा, रिसर्च ऑफिसर। 10 साल से गैर शैक्षणिक कार्य में हैं। इन्हें उज्जैन इंजीनियरिंग कॉलेज भेजा गया था।
12. डॉ. मोहन सेन- संयुक्त संचालक हैं। 15 साल से संचालनायल/आरजीपीवी में गैर शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं। मूल पद : इंजीनियरिंग काॅलेज सागर
13. संजय विनायक- रिसर्च ऑफिसर। 10 साल से संचालनालय में। मूल पद : एसबी पॉलिटेक्निक
14. डाॅ. अखिल सिटोके- रिसर्च ऑफिसर हैं। 10 साल से गैर शैक्षणिक कार्य कर रहे हैं। मूल पद : महिला पॉलिटेक्निक भोपाल

ऐसा क्या लालच है जो बिना वेतन के काम कर रहे हैं

संयुक्त संचालक डाॅ. मोहन सेन, रिसर्च ऑफिसर डॉ. एनके शर्मा और डाॅ. अखिल सिटोके को वेतन नहीं मिल रहा हैं, फिर भी ये कॉलेज लौटने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, इसकी शुरुआत खंडवा पॉलिटेक्निक के प्राचार्य सीबी ढब्बू को रिक्त पद पर संचालनालय में पदस्थ होने से हुई। इन्हें बाद में संयुक्त संचालक बनाया गया। इसके कारण संयुक्त संचालक पद के विरुद्ध वेतन ले रहे एसके राव का वेतन बंद हो गया। वेतन नहीं मिलने से नाराज राव ने आरटीआई आवेदन लगा दिया। इसके प्रभाव में उनका वेतन उप संचालक के पद से निकाला गया। इधर, उप संचालक पद के विरुद्ध वेतन ले रहे रिसर्च ऑफिसर डॉ. सिटोके को वेतन मिलना बंद हाे गया। इसके बाद भी डॉ. सेन और डाॅ. शर्मा को इसी पद पर पदस्थ कर दिया गया। अब इन दोनों को भी वेतन नहीं मिल रहा है। इसके बाद भी ये लोग वापस काॅलेज जाने को तैयार नहीं हैं और न ही शासन इन्हें यहां रिलीव कर रहा है। 

यदि शासन को जरूरत है तो विभाग बदलो, पद रिक्त करो 

यहां बड़ा सवाल यह है कि जब अनुभवी प्रोफेसर कॉलेजों में पढ़ा नहीं रहे तो फिर उन स्टूडेंट्स का क्या हो रहा है जो इनकी कक्षाओं में पढ़ाई करने के लिए आते हैं। उच्च शिक्षा विभाग के रजिस्टर में इनके पद खाली नहीं है जबकि यह तो अपने कर्तव्य स्थल पर उपस्थित ही नहीं है। यदि शासन को इनकी मंत्रालय या संचालनालय में ही जरूरत है तो क्यों ना इनका मंत्रालय में संविलियन कर दिया जाए। उच्च शिक्षा विभाग के खाते से वेतन लेंगे और काम किसी दूसरे विभाग करेंगे, यह कैसी व्यवस्था है। यदि ऐसे कर्मचारियों का जो अपने विभाग में काम नहीं कर रहे, दूसरे किसी विभाग में वर्षों से अटैच है। उनका संविलियन कर दिया जाता है तो कम से कम मूल विभागों में पद रिक्त हो जाएंगे और नई भर्तियां की जा सकेगी।