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नये शोध का नये साल में लाभ लें | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। भारत कार्बन उत्सर्जक देशों में उल्लेखनीय स्थान होने के कारण पर्यावरण सम्बन्धी अनेक व्याधियां झेल रहा है। हाल ही में हुए नये शोधों के मुताबिक भारत भी कार्बन डाइऑक्साइड को ईंधन या निर्माण सामग्री में बदलकर एक नया वैश्विक उद्योग बन सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड तथा पांच अन्य संस्थानों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह बात कही गई है। 

यदि भारत ऐसा करता है तो इससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी और पर्यावरण को फायदा होगा। नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह शोध कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग के बारे में अब तक का सबसे विस्तृत अध्ययन है। इस शोध के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग 10 विभिन्न तरीकों से हो सकता है। इनमें ईंधन, रसायन, प्लास्टिक्स, बिल्डिंग मैटेरियल, मृदा प्रबंधन तथा वानिकी शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने कार्बन डाइआक्साइड के उपयोग की लागत का अध्ययन किया है। उन्होंने इस बात पर विचार किया कि निकलने वाली गैसों या वायुमंडल से कार्बन डाइआक्साइड को कैसे पकड़ा जाए और इसके लिए कौन-सी औद्योगिक प्रक्रिया इस्तेमाल की जाए। 

इस विषय पर पिछले अध्ययनों से आगे जाकर शोधकर्ताओं ने उन प्रक्रियाओं पर भी विचार किया जो फोटोसिंथसिस (प्रकाश संश्लेषण) द्वारा पकड़ी जाने वाली कार्बन डाइआक्साइड का उपयोग करती हैं। शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि गैस के उपयोग के हर तरीके से प्रति वर्ष करीब 0.5 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल हो सकता है। एक गीगाटन एक अरब टन के बराबर होता है। सभी क्षेत्रों में संपूर्ण क्षमता का उपयोग होने पर 10 गीगाटन से अधिक कार्बन डाइआक्साइड का उपयोग हो सकता है। प्रति टन कार्बन डाइऑक्साइड पर करीब 100 डॉलर की लागत आएगी। यह पैमाना वैश्विक है, भारत इस विषय पर और काम करके इस लागत को और कम कर सकता है |

इस अध्ययन से यह साफ हो गया है कि कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग जलवायु परिवर्तन से निपटने के समाधान का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब सभी सरकारें इसके लिए प्रतिबद्धता दिखाएं, नीतियों में बदलाव करें, आवश्यक धन मुहैया कराएं और विभिन्न क्षेत्रों को सहयोग दें। वैसे भी विश्व के सामने वक्त बहुत कम है, हमें तत्काल कार्य करने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के अनुसार 21वीं सदी के शेष वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए वायुमंडल से करीब 100 से 1000 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की आवश्यकता पड़ेगी।

शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने और जलवायु को स्थिर करने के लिए ग्रीन हाउस गैस को हटाना बेहद आवश्यक है। वैसे भी भारत ने अभी तक अपने उत्सर्जनों को कम करने में तत्परता नहीं दिखाई है, हमें जल्दी ही वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को खींचना शुरू करना पड़ेगा। कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग के लिए इस नई तकनीकी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उद्योग कितनी जल्दी उसे अपनाते हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्बन के भंडारण की सीसीएस (कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज) टेक्नोलॉजी अपनाने के भी सुझाव भी दिए गए हैं। एक अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया के समुद्री तटों की चट्टानों (कांटिनेंटल शेल्फ) में कार्बन के भंडारण के लिए पर्याप्त जगह है। अभी दुनिया में सिर्फ दो दर्जन सीसीएस प्रोजेक्ट शुरू हो पाए हैं। इसकी वजह उच्च लागत के साथ-साथ टेक्नोलॉजी की उपयोगिता के बारे में अनिश्चितता भी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि बहुत कम समय में चट्टानों में कार्बन डाइऑक्साइड के भंडारण के लिए कुएं (इंजेकशन वेल) निर्मित किए जा सकते हैं। इससे आईपीसीसी द्वारा निर्धारित लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। आईपीसीसी ने दुनिया में सीसीएस टेक्नोलॉजी के जरिए 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 13 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य रखा है।

एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेताया है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में वृद्धि से बच्चों की बौद्धिक क्षमता पर असर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इस बात के प्रमाण जुटाए हैं कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते हुए स्तर से भविष्य में कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता कमजोर हो जाएगी। भारत को इस विषय को केंद्र में रख कर योजना बनाना चाहिए। नागरिकों को भी इस हेतु सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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