MP HIGH COURT का बड़ा फैसला, अधिकारी द्वारा कर्तव्य में लापरवाही प्रथमदृष्टया भ्रष्टाचार

Bhopal Samachar
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Madhya Pradesh High Court ने सरकारी सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए ऐतिहासिक फैसला दिया है। मध्य प्रदेश में बहुत सारे अधिकारी और कर्मचारी जब तक रिश्वत ना मिले, तब तक अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते। शासन व्यवस्था में ऐसी लापरवाही के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस प्रकार की लापरवाही को "प्रथमदृष्टया भ्रष्टाचार" घोषित करते हुए, इस प्रकार के मामलों को लोकायुक्त की जांच के योग्य आदेशित किया है।

भोपाल के गोविंदपुरा तहसीलदार दिलीप चौरसिया का मामला

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के गोविंदपुरा तहसीलदार दिलीप चौरसिया ने भोपाल कलेक्टर के Sarfaesi Act (सिक्योरिटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एन्फोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट) के तहत कार्रवाई के आदेश का आठ महीने तक पालन नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने High Court से आदेश में संशोधन के लिए अपील की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। Madhya Pradesh High Court ने तहसीलदार की आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) की जांच के निर्देश दिए हैं।

तहसीलदार दिलीप चौरसिया - Sarfaesi Act

High Court की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिनेश कुमार पालीवाल शामिल थे, ने कहा कि तहसीलदार दिलीप चौरसिया ने Sarfaesi Act के तहत आदेश का पालन नहीं किया, जो लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार (Corruption Case) की संदिग्ध स्थिति बना देता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारियों के लिए यह आदेश एक मिसाल कायम करेगा। जस्टिस ने कहा, “दया का समय बहुत पहले बीत चुका है। अब जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी।”

तहसीलदार की अपील और आरोप

तहसीलदार चौरसिया ने High Court से 26 जून 2025 के आदेश में संशोधन की मांग की थी। इस आदेश में भोपाल कलेक्टर को तहसीलदार की कर्तव्य में लापरवाही (Negligence in Duty) की जांच तीन महीने में पूरी करने और लोकायुक्त को उनकी आय से अधिक संपत्ति की जांच करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यदि संपत्ति में अनियमितता पाई जाती है, तो तहसीलदार के खिलाफ केस दर्ज किया जाए।

तहसीलदार दिलीप चौरसिया ने क्या गलती की

मामला भोपाल के Equitas Small Finance Bank से जुड़ा है। बैंक के वकील रवींद्र नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि कुछ लोगों ने बैंक से लोन लिया था, जिसे नहीं चुकाने पर उनकी संपत्ति जब्त करने (Property Seizure) के लिए बैंक ने एडीएम को आवेदन दिया। 23 जुलाई 2024 को एडिशनल कलेक्टर ने Sarfaesi Act के तहत संपत्ति जब्त कर बैंक को सौंपने का आदेश दिया। लेकिन तहसीलदार दिलीप चौरसिया ने इस आदेश का पालन नहीं किया।

कर्तव्य में लापरवाही प्रथमदृष्टया भ्रष्टाचार: हाई कोर्ट

मामला High Court पहुँचने पर जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस डीके पालीवाल की खंडपीठ ने इसे प्रथमदृष्टया भ्रष्टाचार (Corruption Case) का मामला माना। कोर्ट ने कहा कि तहसीलदार ने संभवतः ऋणधारकों के साथ सांठगांठ की, जिनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश था। कोर्ट ने Sarfaesi Act की धारा 14 के तहत 23 जुलाई 2024 के आदेश का पालन न करने को जानबूझकर लापरवाही और भ्रष्टाचार माना।

दया याचिका का परिणाम

High Court ने तहसीलदार की दया याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब कोई लोक सेवक जानबूझकर भ्रष्टाचार में लिप्त होकर कर्तव्य का पालन नहीं करता, तो उसे जवाबदेह ठहराना ही न्याय है। कोर्ट ने लोकायुक्त को तहसीलदार की आय से अधिक संपत्ति की जांच करने और कलेक्टर को लापरवाही की जांच पूरी करने का आदेश दिया।
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