अपने नाम और नीयत में बसे गाँधी के साथ चलने का समय | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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अपने नाम और नीयत में बसे गाँधी के साथ चलने का समय | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। गाँधी के देश के बड़े हिस्से में कल दिन भर हिंसा का तांडव हुआ। ट्रेन, बस, मोटर सायकिल के साथ पुलिस चौकी भी फूंक दिए गये। गोली भी चली, मौत भी हुई, घायलों में पुलिस जवान ज्यादा। यह सब एक कानून के पारित होने और एक और कानून आने के अंदेशे से हो रहा है। गाँधी जी ने पूरे जीवन विरोध किया।आज देश में जो विरोध दिख रहा है, वह ‘विरोध’ नहीं “बदला” दिख रहा है। ऐसा लग रहा है बिना विचारे सब कुछ हो रहा है और नुकसान राष्ट्र का हो रहा है। बापू ऐसे समय पर हमेशा याद आते हैं।

2 अप्रेल 1931 को गाँधी जी ने यंग इण्डिया में लिखा था “शासन के खिलाफ विवेक रहित विरोध से अनियंत्रित स्वच्छन्दता की स्थिति पैदा होती है और समाज अपने हाथों अपना सर्वनाश कर डालेगा।” भारत में यही हो रहा है। संसद में पारित कानून के विरोध में सडक पर उतरने का आव्हान कौन सा गाँधी मार्ग है और हर आन्दोलन का जवाब बल प्रयोग कौनसी गाँधीवादी नीयत है। ये सब वे लोग कर रहे हैं, जो गाँधीवाद को अपनी नीयत और नियति मानते हैं और उनके विरोध में जो खड़े है उनके नाम में गाँधी बसे हैं। सिर्फ प्रात:स्मरण में जोड़ने या दो अक्तूबर और 30 जनवरी को राजघाट जाने से आप गाँधी के खास नहीं हो जाते। 

आपके कृतित्व से गाँधी की सुरभि आना चाहिए, अफ़सोस देश में कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं कर रहा। आज देश जलते हुए हिस्सों में गाँधीवाद की जरूरत है, नाम से नहीं काम से गाँधी होने का प्रमाण दीजिये। दिल्ली से हवाई जहाज नहीं उड़े, 18 मेट्रो स्टेशन बंद करना पड़े लखनऊ में पुलिस पर हमला, पुलिस चौकी को स्वाहा कर दिया। मीडिया की ओ बी वेन को आग लगा दी गई। बंगलुरु और हैदराबाद में भी कुछ घटा। देश की सारी प्रादेशिक राजधानियों में धारा 144 लागू है। ताज्जुब, इस सारे आन्दोलन का नेतृत्व करने कोई आगे नहीं आ रहा। सुरक्षा मामलों के जानकार इस सब में आई एस आई का हाथ बता रहे हैं। यह सब साफ होना चाहिए, आन्दोलन, उसकी वजह, आधार सहित वह भी सविनय। यही गाँधी जी का तरीका था। रेल फूंकना, पेट्रोल बम फेंकना, कपड़ों से उपद्रवियों की पहचान बताना कौन से देश का तरीका है।

नागरिकता कानून पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नागरिकता कानून और एनआरसी को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की बात कह रही हैं। उन्होंने बीजेपी को चुनौती देकर कहा कि अगर उनमें हिम्मत है तो एनआरसी-सीएए पर संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह कराना चाहिए| उन्होंने यहाँ तक कहा, बीजेपी नागरिकता कानून को हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की एक लड़ाई बनाना चाहती है। इन सब बातों में देश हित कहाँ है ? सब अपने अजेंडे पर चल रहे हैं। देश उनकी प्राथमिकता नहीं है।

सिर्फ सरकार से या प्रतिपक्ष से इस आग को बुझाने की अपील करना कोई समझदारी नहीं है। उनके आपने राग-द्वेष हैं। आग कितनी भडके, कब तक भडके इसके पीछे उनके गणित रहे हैं और आगे भी हो सकते हैं। साथ ही यह भी सत्य है,इस आग की जद में में हमेशा नागरिक आते हैं, और वो हम सब है।

हम सब को गांधीजी का उपकार मानना चाहिए कि वे बता गये कि उनके सपनों का भारत कैसा हो। हमारे राजनेता उस पर चलना तो दूर उस पद्धति पर विचार तक नहीं करना चाहते, जिसमे सबका सम्वाद आदर और सहमति हो। सरकार की दृष्टि में प्रतिपक्ष खोटा है, और प्रतिपक्ष की दृष्टि में सरकार हेकड़ीबाज। यह प्रतिस्पर्धा इन दोनों के बीच हमेशा चलेगी, रास्ता हमे खोजना है और वह सिर्फ गाँधीवाद की इस भावना में निहित है “ देश प्रेम का धर्म हमे यह सिखाता है की व्यक्ति को परिवार के लिए,परिवार को ग्राम के लिए , ग्राम को जनपद के लिए , जनपद को प्रदेश के लिए और प्रदेश को राष्ट्र के लिए समर्पित होंना चाहिए “- गाँधी इन इंडियन विलेजेज पृ० 170 । अफ़सोस राजनेता ऐसा नहीं सोचते, पर हम तो सोचे।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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